Justice GR Swaminathan Issue: मद्रास हाईकोर्ट के जज जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ विपक्षी सांसदों की ओर से महाभियोग प्रस्ताव लाया गया है. देश के 36 पूर्व जजों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है. इससे पहले 56 पूर्व जज भी विरोध जता चुके हैं.
इन जजों ने एक खुले पत्र में कहा कि यह कदम जजों पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश है. अगर ऐसी कोशिशों को बढ़ावा दिया गया, तो यह लोकतंत्र और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाएगा. जजों के फैसलों की जांच अपील और कानूनी समीक्षा से होनी चाहिए, न कि महाभियोग की धमकी से.
स्वामीनाथन के समर्थन में 36 पूर्व जज
शनिवार को जारी किए गए इस पत्र में पूर्व जजों ने लिखा कि जज संविधान और अपनी शपथ के प्रति जवाबदेह होते हैं. वे राजनीतिक दबाव के लिए नहीं बने हैं. पत्र में चार पूर्व मुख्य न्यायाधीशों का जिक्र किया गया है, जिनके खिलाफ भी महाभियोग की कोशिश हुई थी. इनमें दीपक मिश्रा, रंजन गोगोई, ए.एस. बोबड़े और डीवाई चंद्रचूड़ शामिल हैं. पूर्व जजों ने कहा कि सभी सांसदों और नागरिकों को विपक्ष के इस कदम की निंदा करनी चाहिए. यह न्यायपालिका पर हमला है और इसे रोकना जरूरी है.
जज के खिलाफ महाभियोग क्यों?
यह पूरा मामला 1 दिसंबर 2025 को शुरू हुआ. जस्टिस स्वामीनाथन ने तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर मंदिर और दरगाह से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाया. यह फैसला हिंदुओं के पक्ष में था. मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने एक राइट-विंग एक्टिविस्ट की याचिका पर सुनवाई की. जज ने सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर के अधिकारियों को शाम 6 बजे तक दीपाथून पर दीपक जलाने का आदेश दिया. जज ने स्पष्ट कहा कि इससे दरगाह या मुसलमानों के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
तमिल सरकार ने किया विरोध
इस फैसले के बाद तमिलनाडु सरकार नाराज हो गई. सरकार ने आदेश मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने कानून-व्यवस्था बिगड़ने का हवाला दिया. इसी वजह से विरोध बढ़ा. 9 दिसंबर को इंडिया गठबंधन के 107 सांसदों ने जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया. इनमें प्रियंका गांधी वाड्रा भी शामिल हैं. विपक्ष का कहना है कि जज का फैसला गलत था और इससे समस्या हुई.
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल
पूर्व जजों का मानना है कि महाभियोग जैसे कदम जजों को डराते हैं. इससे वे स्वतंत्र फैसले नहीं ले पाएंगे. लोकतंत्र में न्यायपालिका का रोल बहुत महत्वपूर्ण है. अगर राजनीतिक पार्टियां ऐसे प्रस्ताव लाती रहीं, तो न्याय व्यवस्था कमजोर हो सकती है. देश भर में इस मुद्दे पर चर्चा हो रही है. कई लोग पूर्व जजों के समर्थन में हैं. विपक्ष का यह कदम न्यायपालिका की आजादी पर सवाल उठा रहा है.
आगे क्या होगा?
अभी महाभियोग प्रस्ताव पर कोई फैसला नहीं हुआ है. संसद में इस पर बहस हो सकती है. लेकिन पूर्व जजों का विरोध इसे मुश्किल बना सकता है. यह मामला दिखाता है कि राजनीति और न्यायपालिका के बीच तनाव बढ़ रहा है. सभी को मिलकर न्याय व्यवस्था की रक्षा करनी चाहिए.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

