Bharat Express DD Free Dish

IPAC मामला: 22 मई तक सुनवाई टली, ‘संवैधानिक विफलता’ पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

Supreme Court Case: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल आईपैक मामले की सुनवाई 22 मई तक टालते हुए ‘संवैधानिक तंत्र की विफलता’ पर अहम टिप्पणी की.

Supreme Court order
Edited by Shubhra Rai

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल आईपैक मामले की सुनवाई 22 मई तक टाल दी है. इस दौरान अदालत ने राज्य में ‘संवैधानिक तंत्र की विफलता’ और कानून के शासन पर महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की.

पश्चिम बंगाल में कानून के शासन और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बहस तेज हो गई है. हालिया सुनवाई में जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने एजेंसी के अनुरोध पर मामले को 22 मई तक के लिए स्थगित कर दिया है. इस सुनवाई के दौरान राज्य में कानून-व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर केंद्र और न्यायपालिका के बीच महत्वपूर्ण चर्चा हुई.

एजेंसी की मांग मामले की सुनवाई टाली

पश्चिम बंगाल आइपैक मामले में सुप्रीम कोर्ट 22 मई को सुनवाई करेगा. जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने एजेंसी की मांग पर मामले की सुनवाई को टाल दिया है. पिछली सुनवाई में कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा था कि संवैधानिक तंत्र के ध्वस्त होने का तर्क “दूरगामी परिणाम” दे सकता है. क्योंकि इससे राष्ट्रपति शासन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है.

न्यायिक अधिकारियों को घेर लिया

ईडी ने कोर्ट को बताया था कि वह पश्चिम बंगाल राज्य में संवैधानिक तंत्र के पूरी तरह ध्वस्त होने का दावा नहीं कर रहा है. ईडी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया था कि ईडी का तर्क है कि आइपैक मामले में कानून के शासन के उल्लंघन का था. साथ ही इसे संवैधानिक तंत्र की विफलता के रूप में नहीं जाना चाहिए.

एसजी मेहता ने सुनवाई के दौरान मालदा जिले में हुई घटना का जिक्र किया, जहां भीड़ ने न्यायिक अधिकारियों को घेर लिया था.

संवैधानिक तंत्र पूरी तरह से ध्वस्त

इसपर जस्टिस अंजारिया ने एसजी मेहता से पूछा था कि क्या ईडी यह तर्क दे रही है कि राज्य में संवैधानिक तंत्र पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है. जस्टिस अंजारिया ने संकेत दिया था कि यह एक अतिवादी दृष्टिकोण हो सकता है, क्योंकि अनुच्छेद 356 के अनुसार संवैधानिक तंत्र ध्वस्त होना किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का आधार है. इसके जवाब में एसजी मेहता ने कहा था कि यह एक बड़ा मुद्दा है.

स्थिति कई वर्षों से बनी हुई

इसपर फिर से जस्टिस अंजारिया ने कहा था कि हमें उम्मीद है कि आप उस ओर इशारा नहीं कर रहे हैं. तब एसजी मेहता ने कहा था कि ईडी इस बात पर कभी बहस नहीं कर सकता. मैं इसका जवाब इसी तरह दूंगा. ईडी इस बात पर बहस नहीं कर सकता और मैं अधिकारियों तथा संस्था के पक्ष में हूं. क्योंकि यह स्थिति कई वर्षों से बनी हुई है.

अनुच्छेद 32 के तहत शक्ति के प्रयोग से संबंधित

इसपर जस्टिस अंजारिया ने कहा था कि हमें नहीं पता. हम केवल यह पूछ रहे हैं कि क्या ऐसा है? जवाब में एसजी ने कहा था कि नहीं, ईडी इसका जबाब नहीं दे सकती और यह मेरे विचार में नहीं है. ऐसा कुछ भी गुप्त नहीं है. वही जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने एसजी मेहता से पूछा था कि सवाल अनुच्छेद 32 के तहत शक्ति के प्रयोग से संबंधित है.

अनुच्छेद 14 से जुड़ा

एसजी मेहता ने स्पष्ट करते हुए कहा था कि यही सीमित मुद्दा है. मैं कानून के शासन का उत्तर दे रहा हूं, क्योंकि कानून का शासन अनुच्छेद 14 से जुड़ा है, जो मुझे अनुच्छेद 32 के तहत दायर करने का अनुमति प्रदान करता है. यही वह उद्देश्य है जिसके लिए मैं ‘विधान के शासन’ शब्द का प्रयोग कर रहा हूं, न कि संवैधानिक तंत्र के टूटने’ से संबंधित.

बीआई ऑफिस के सामने धरना दिया

सुनवाई के दौरान एसजी मेहता ने दलील देते हुए कहा था कि राज्य में कानून और व्यवस्था का पूर्णतः उल्लंघन हुआ है. उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहली बार ऐसा नहीं किया है. उन्होंने बताया कि सीबीआई ने 2019 में तत्कालीन कोलकाता पुलिस आयुक्त से पूछताछ करने का प्रयास किया था, तब मुख्यमंत्री ने सीबीआई ऑफिस के सामने धरना दिया था.

यह भी पढ़ें: CBSE 12th Result 2026: सीबीएसई 12वीं का रिजल्ट घोषित, 85.20% छात्र पास; लड़कियों ने मारी बाजी, जानें कैसे चेक करें रिजल्ट

-भारत एक्सप्रेस 



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read