उपभोक्ता आयोगों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की गई है यह याचिका केरल की एनजीओ परिवर्तन की ओर से दायर की गई है.
यह फैसला जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस एम. एम सुंदरेश की पीठ ने 21 मई 2025 को दिया था.
फैसले पर पुनर्विचार करने की गई मांग
याचिका में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की गई है. कोर्ट ने अपने फैसले में उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों (राज्य एवं जिला) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति, पात्रता, चयन और कार्यकाल से संबंधित विस्तृत दिशा निर्देश दिए गए थे. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जिला उपभोक्ता आयोग का अध्यक्ष केवल कार्यरत या सेवानिवृत्त जिला जज ही हो सकता है.
जबकि पहले नियम था कि ऐसा व्यक्ति भी अध्यक्ष बन सकता है जो जिला जज बनने के योग्य हो या कम से कम 7 साल का वकालत का अनुभव हो, वही इसके पात्र हो सकता था.
अनुभवी अधिवक्ताओं को किया गया बाहर
एनजीओ परिवर्तन की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि नए प्रावधान से अनुभवी अधिवक्ताओं को पूरी तरह से बाहर कर दिया गया है, जबकि संविधान के अनुच्छेद 233 (2) के तहत वे जिला जज बनने के लिए योग्य माने जाते हैं.
दायर पुनर्विचार याचिका में यह भी कहा गया है कि फैसले के बिना ठोस विश्लेषण के एक आयुक्तिसंगत वर्गीकरण बना दिया है, जिससे योग्य अधिवक्ताओं के अधिकारों का हनन होता है. दायर याचिका में गैर-न्यायिक सदस्यों की पुनर्नियुक्ति के लिए अनिवार्य लिखित परीक्षा की शर्त को भी चुनौती दी गई है.
याचिकककर्ता के अनुसार शर्त अनुपातहीन व असंगत
याचिकककर्ता के मुताबिक यह शर्त अनुपातहीन और असंगत है तथा इससे आयोग के कामकाज में निरंतरता बाधित होगी. याचिका में यह भी कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को व्यापक शक्तियां जरूर देता है, लेकिन वह अदालत को यह अधिकार नहीं देता कि वह नए योग्यता मानदंड तय करें या इसको लेकर कानून बनाने के लिए बाध्य करें.
ऐसा करना विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप है.
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-भारत एक्सप्रेस
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