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Sabarimala Case: क्या संविधान उन भक्तों की रक्षा नहीं करेगा जिन्हें देवता छूने की अनुमति नहीं?- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े पुनर्विचार याचिकाओं पर 16 दिन चली मैराथन सुनवाई के बाद 9 जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया है.

Supreme Court

Sabarimala Case: सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से संबंधित मामले में दायर विभिन्न पुनर्विचार याचिकाओं पर 16 दिन तक चली मैराथन सुनवाई के बाद 9 जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. पीठ में सीजेआई सूर्यकांत समेत जस्टिस बी. वी नागरत्ना, जस्टिस एम. एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन मसीह, जस्टिस प्रसन्ना वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल है.

यह मामला केवल सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और संवैधानिक अधिकारों की सीमा तय करने वाला बड़ा संवैधानिक विवाद बन चुका है.

दाउदी बोहरा समुदाय से जुड़े मामलों पर भी हो रही है सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षकारों को 29 मई तक लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी. जिनमें दाउदी बोहरा समुदाय से संबंधित मुद्दे भी शामिल है. मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी, गोपाल सुब्रमण्यम, राजीव धवन, राकेश द्विवेदी, सी. एस वैधनाथन, जयदीप गुप्ता, अभिषेक मनु सिंघवी, विजय हंसारिया, संजय हेगड़े, मेनका गुरुस्वामी, नीरज किशन कौल, गोपाल शंकर नारायण ने मामले में जिरह की है.

मामले की सुनवाई के दौरान सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर के मुख्य पुजारी से पूछा है कि क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा नही करेगा, जिसे देवता को छूने की अनुमति नहीं है. कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब पुजारी की ओर से पेश वकील द्वारा कहा गया है जब कोई  भक्त पूजा के लिए मंदिर जाता है, तो वह देवता की विशेषताओं के विरोध में नहीं हो सकता. इस पर सबरीमाला के वकील वी. गिरी ने कहा किसी भी मंदिर में होने वाले रीति रिवाज उस धर्म का अभिन्न हिस्सा होते हैं.

मंदिर परंपराओं में राज्य के हस्तक्षेप को लेकर पक्षकारों में बहस

मामले की सुनवाई के दौरान पक्षकारों ने.संविधान के अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दिया. उनका तर्क है कि राज्य को धार्मिक प्रथाओं के मूल स्वरूप में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. वही याचिककर्ताओ का कहना है कि महिलाओं को प्रवेश से वंचित करना समानता के अधिकार के खिलाफ है. सुनवाई के दौरान त्रावणकोर-कोचीन मंदिर प्रवेश नियमों का नियम 6 केवल सबरीमाला मंदिर तक ही सीमित नही है, बल्कि दक्षिण भारत के सभी मंदिरों पर लागू होता है.

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भारत एक्सप्रेस



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