20 Rupees Bribe Case: सुप्रीम कोर्ट ने 20 रुपए की रिश्वत के मामले में दोषी दो सरकारी कर्मचारियों को 30 साल बाद बड़ी राहत दी है. अदालत ने वर्ष 1996 में दर्ज 20 रुपये की रिश्वत मांगने के आरोप से जुड़े मामले में दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए दोनों दोषियों को बरी कर दिया है.
क्या है मामाला?
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने यह फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार के तलाटी-सह-मंत्री, यानी गांव स्तर के राजस्व अधिकारी और उसके अधीन काम करने वाले एक चपरासी को राहत दी है. यह मामला रफिकमिया अहमदमिया मलिक बनाम गुजरात सरकार से जुड़ा है. दोनों कर्मचारियों पर आरोप था कि सरकारी काम के एवज में 20 रुपए की रिश्वत मांगी गई थी.
आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं
मामले में बाद में चपरासी के पास से 20 रुपये बरामद किए गए थे और इसी आधार पर दोनों कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल चपरासी के पास से 20 रुपये बरामद हो जाने से रिश्वतखोरी का अपराध साबित नहीं हो जाता. भ्रष्टाचार के मामले में दोषसिद्धि के लिए रिश्वत की मांग साबित होना एक बुनियादी और जरूरी शर्त है. अदालत ने पाया कि इस मामले में रिश्वत मांगने के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय सबूत नहीं थे. ऐसे में केवल रकम की बरामदगी के आधार पर आरोपियों की सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता.
रकम की बरामदगी अपने आप मे पर्याप्त नहीं
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मामलों में रिश्वत की रकम की बरामदगी अपने आप मे पर्याप्त नहीं है. अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होता है कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी और उसके बाद रकम स्वीकार की गई. इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने दोनों सरकारी कर्मचारियों की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया. बता दें कि फरवरी 1996 में एक छात्र ने आयकर सर्टिफिकेट के लिए बेचरी ग्राम पंचायत कार्यालय से संपर्क किया, जिसकी जरूरत कुछ शैक्षिक रियायतें पाने के लिए थी.
मामला SC पहुचने के बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि तलाटी-सह-मंत्री ने सर्टिफिकेट जारी करने के लिए 120 रुपए की मांग की थी. 100 रुपये खुद के लिए और 20 रुपये चपरासी के लिए. छात्र ने एंटी करप्शन ब्यूरो से संपर्क किया, जिसने जाल बिछाया और गिरफ्तार कर लिया. निचली अदालत ने 1999 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13 (1(d) के तहत दोनों कर्मचारियों को दोषी ठहराया और 2015 में गुजरात हाई कोर्ट ने इसे बरकरार रखा. बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुचा. जिसपर कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है.
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-भारत एक्सप्रेस
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