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छात्रों के लिए बड़ी खबर! UGC के ‘इक्विटी नियम 2026’ पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जानें क्यों लगी रोक?

Supreme Court: यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशन 2026 पर सुप्रीम कोर्ट में 4 हफ्ते बाद सुनवाई होगी. केंद्र सरकार नियमों पर पुनर्विचार में जुटी.

सुप्रीम कोर्ट की इमारत और यूजीसी का लोगो

यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में 4 सप्ताह बाद होगी अगली सुनवाई

Edited by Shubhra Rai

Supreme Court: यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट चार सप्ताह बाद सुनवाई करेगा. मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशन 2026 पर दोबारा विचार किया जा रहा है. लेकिन यह किस दिशा में जाएगा, यह नहीं कह सकता.

क्या है मामला?

एसजी ने कोर्ट को बताया कि मामले में अभी तक जवाब दाखिल नहीं किया गया है. सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए समय दे दिया है. साथ ही कोर्ट ने यूजीसी को सभी याचिकाओं में उठाए गए मुद्दों पर एक व्यापक जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. कोर्ट यूजीसी की नए नियमों पर रोक लगा रखा है.

दायर याचिका में समाज को बांटने का आरोप

दायर याचिका में सरकार पर यूजीसी के जरिये समाज को बांटने का आरोप लगाया गया है. याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि जातिगत भेदभाव सिर्फ आरक्षित वर्ग के साथ ही नहीं, बल्कि किसी भी वर्ग के साथ हो सकता है. इसलिए इसे केवल कुछ समुदायों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए. इसको लेकर कई याचिका दायर की गई है. जिसपर सुनवाई के बाद कोर्ट यूजीसी के नए नियम पर रोक लगा रखा है. याचिकाकर्ताओं ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी 2026 को नए नियमों को लागू किया है, जिसके खिलाफ यह याचिका दायर की गई है. इन नियमों का मूल उद्देश्य कैंपस के अंदर जातिगत भेदभाव को जड़ से खत्म करना और वंचित वर्ग के छात्रों को सुरक्षित शैक्षणिक परिवेश प्रदान करना था.

औपचारिक शिकायत दर्ज कराने का अधिकार नहीं

हालांकि इन नियमों ने ऐसी बहस को जन्म दे दिया, जिसने न केवल छात्र राजनीति को गर्मा दिया है, बल्कि सरकार को भी अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है. याचिकाकर्ता की दलील है कि नियम 3 (सी) के तहत जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया है. इसके चलते सामान्य वर्ग से जुड़े लोगों को यदि किसी प्रकार की जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़े तो उन्हें औपचारिक शिकायत दर्ज कराने का अधिकार नहीं मिल पाता.

मान्यता रद्द करने या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई

दायर याचिका में इसे संविधान के समानता और मौलिक अधिकारों से जुड़ी धाराओं के खिलाफ बताया गया है. सुप्रीम कोर्ट से नियम को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है. यूजीसी ने स्पष्ट किया है कि नियमों का पालन न करने पर संस्थानों की मान्यता रद्द करने या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई की जा सकती है. वही यूजीसी की दलील है कि वर्ष 2020 से 2025 के बीच जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है.

यूजीसी के अनुसार रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद ऐसी निगरानी व्यवस्था जरूरी हो गई थी. इसको लेकर दर्जनों याचिका अभी तक दायर की जा चुकी है. दायर सभी याचिकाओं में एक ही मांग है कि लागू नियम को असंवैधानिक घोषित किया जाए.

यह भी पढ़ें-50 साल पुरानी कानूनी उलझन खत्म: जानिए ‘उद्योग’ की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 5 बड़ी बातें

-भारत एक्सप्रेस



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