IPS Officer Maternity Training Rule: सुप्रीम कोर्ट ने गर्भवती महिला आईपीएस अधिकारियों को प्रशिक्षण से रोकने वाले 1993 के गृह मंत्रालय के नियम को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है. अदालत ने पूछा कि यदि कोई महिला अधिकारी चिकित्सीय रूप से पूरी तरह फिट है, तो उसे केवल गर्भवस्था या मातृत्व के आधार पर प्रशिक्षण से क्यों रोका जाए. जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर की पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है. अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि 9 जुलाई तक बताए कि आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर को जून से शुरू हुए फेज II प्रशिक्षण में। शामिल होने दिया जा सकता है या नहीं.
9 महीने बाद प्रशिक्षण के लिए फिट
मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि महिलाओं के हित मे बनाए गए नियमों का इस्तेमाल उनके अधिकार सीमित करने के लिए नहीं किया जा सकता है. अदालत ने यह भी कहा कि सभी महिलाओं पर एक जैसा नियम लागू करना उचित नहीं है, क्योंकि हर महिला की स्वास्थ्य स्थिति अलग हो सकती है. कोई महिला प्रसव के 9 महीने बाद प्रशिक्षण के लिए फिट हो सकती है, जबकि कोई दो साल बाद भी फिट न हो. इसलिए ऐसे मामलों में एक समान नियम लागू करने के बजाए प्रत्येक मामले का व्यक्तिगत आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए. 23 अगस्त 1993 के गृह मंत्रालय के नियम के तहत यदि किसी आईपीएस प्रोबेशनर को प्रशिक्षण तत्काल रोक दिया जाता है और प्रसव के एक वर्ष बाद ही उसे दोबारा प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी जाती है.
कार्यालय ज्ञापन का हवाला देकर प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति नहीं दी
मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि यदि एक अधिकारी को छूट दी गई तो भविष्य में ऐसे कई मामलों में यही मांग उठेगी. वही उर्वशी सेंगर की ओर से कहा गया है अतीत में कुछ महिला अधिकारियों को ऐसे मामलों में छूट दी जा चुकी है. याचिकाकर्ता उर्वशी सेंगर जो 2023 बैच की मध्य प्रदेश कैडर की आईपीएस अधिकारी हैं, ने बताया कि उन्होंने सितंबर 2025 में बच्चे को जन्म दिया था और जून 2026 में शुरू हुए फेज II प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए खुद को चिकित्सीय रूप से फिट बताया था. इसके बावजूद 1993 के कार्यालय ज्ञापन का हवाला देकर उन्हें प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई.
दायर याचिका में कहा गया है कि आज के समय मे आधुनिक चिकित्सा और व्यक्तिगत मेडिकल मूल्यांकन को आधार बनाया जाना चाहिए, न कि मातृत्व के आधार पर सभी महिलाओं पर समान रूप से प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए. याचिका में कहा गया है कि आईपीएस अधिकारियों के लिए अब भी 1993 का पुराना नियम लागू रखना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है.
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-भारत एक्सप्रेस
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