अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर कर चुनावी वादों के वित्तीय प्रभाव, मुफ्त की रेवड़ियों पर रोक और घोषणापत्रों के लिए एक निश्चित प्रारूप लागू करने की मांग की है. (PC: भारत एक्सप्रेस)
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने शौर्य चक्र से सम्मानित दिवंगत जनरल रिजर्व इंजीनियरिंग फोर्स के एक कर्मचारी की विधवा को बड़ी राहत मिल गई है. कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह विधवा कुलदीप कौर को 10 लाख रुपए की अतिरिक्त राशि चार सप्ताह के भीतर जारी करे.
शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए निर्देश दिया
जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह निर्देश दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि मोहन सिंह ने डियूटी के दौरान अपनी जान गंवाई थी और उनकी बहादुरी को देश के तीसरे सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था. ऐसी परिस्थिति में परिवार या विधवा को अपने अधिकार के लिए लंबे समय बाद अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.
मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया
यह मामला 10 जुलाई 2000 का है. कर्मचारी ने भारत-चीन सीमा पर सड़क निर्माण कार्य के दौरान अन्य सहकर्मियों की जान बचाते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए थे. जिसके लिए उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था. मोहन सिंह उस समय जीआरईएफ में ओवरसियर के पद पर तैनात थे. काम के दौरान पहाड़ी से अचानक एक बड़ा पत्थर और मलबा नीचे की ओर गिरने लगा.
मोहन सिंह ने खतरा देखते ही वहां काम कर रहे लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कहा. इसके बाद उन्होंने मशीनों और उपकरणों को भी हटाने में मदद की, ताकि कर्मचारियों की जान बचाने के साथ-साथ सरकारी उपकरणों को भी नुकसान से बचाया जा सके. इसी दौरान वह खुद मलबे की चपेट में आ गए और करीब 70 मीटर गहरी घाटी में गिर गए.
19 अक्टूबर 2001 को शौर्य चक्र से सम्मानित
उनकी इस असाधारण बहादुरी के लिए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत 19 अक्टूबर 2001 को शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया. मोहन सिंह की पत्नी कुलदीप कौर ने 2005 में विशेष पारिवारिक पेंशन की मांग की थी. हालांकि उनकी मांग को खारिज कर दी गई. मामले की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि उनको मुआवजे के तौर पर 1, 84, 170 रुपये का भुगतान हो चुका है. इसलिए उन्हें उदार पेंशन लाभ नहीं दिया जा सकता. इसके बाद कुलदीप कौर ने पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट का रुख किया.
हाई कोर्ट ने सीसीएस रूल्स 1939 की कैटेगरी C में माना था और असाधारण पेंशन का हकदार बताया था. हालांकि बकाया राशि का लाभ सीमित अवधि से देने का आदेश दिया गया था. इसके बाद पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
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-भारत एक्सप्रेस
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