सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न श्रेणियों के मामलों के लिए 15, 20 और 30 दिन की समय-सीमा तय की है और हाई कोर्ट को प्रक्रियाएं सुधारने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने कहा कि कानूनी सहायता केवल नीति नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है.
अपील के लिए समय सीमा तय
कानूनी सहायता प्राप्त करने वाले कैदियों की अपीलों में हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) जारी किया है. जिसमें अपील दायर करने के लिए समय सीमा तय किया गया है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह आदेश दिया है.
कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट को न्यायिक रिकॉर्ड के अनुवाद और हस्तांतरण की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए प्रशासनिक सुधार करने का निर्देश दिया है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी एसओपी के मुताबिक ग्रुप के तहत- मौत की सजा, उम्रकैद की सजा, 10 वर्ष या उससे अधिक की सजा वाले मामले के लिए 15 दिन की समय सीमा तय की गई है.
20 दिन की समय सीमा
ग्रुप बी में मध्यय अवधि की सजा और मानवाधिकारों से जुड़े मामले के लिए 20 दिन की समय सीमा तय की गई है. जबकि ग्रुप सी में अन्य सभी मामलों को रखा गया है. जिसके लिए 30 दिन की समय सीमा तय की गई है. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया है कि जिन मामलों में स्वतंत्रता का गंभीर हनन होता है, उन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि लंबे समय तक होने वाले अन्याय को रोक जा सके. सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में दायर याचिका पर सुनवाई के बाद यह एसओपी जारी किया है.
अपीलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
शंकर महतो नामक व्यक्ति की अपील पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने पहली बार कानूनी सहायता अपीलों में होने वाली देरी पर संज्ञान लिया था. पटना हाई कोर्ट ने 2014 में मौत की सजा सुनाई थी. 2017 में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया था कि कानूनी सहायता वाले मामलों में अपीलों को दाखिल करने में बहुत ज्यादा देरी हो रही है.
इसके कारणों की जांच और आवश्यक दिशा निर्देश जारी करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील सुश्री विभा दत्ता मखीजा को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया था.
कानूनी सहायता केवल नीतिगत मामला नहीं
सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी और राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण जैसी संस्थाओं के साथ वर्षो तक विचार विमर्श करने के बावजूद समस्या बनी हुई है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि कानूनी सहायता केवल नीतिगत मामला नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक जिम्मेदारी है, जो संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय के आदर्शों और अनुच्छेद 39 A के जनादेश से जुड़ी है.
-भारत एक्सप्रेस
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