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‘रिक्शा खींचना पसंद नहीं मजबूरी है’, सुप्रीम कोर्ट ने मानव गरिमा और सामाजिक न्याय पर उठाए सवाल

Legal News: सुप्रीम कोर्ट ने हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा को अमानवीय प्रथा बताया. सीजेआई बीआर गवई ने कहा, यह आजीविका की मजबूरी है, न कि किसी की पसंद. कोर्ट ने ई-रिक्शा के विकल्प और रिक्शा चालकों के पुनर्वास पर जोर दिया..

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट

Legal News: सुप्रीम कोर्ट ने टीएन गोदावर्मन मामले में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सीजेआई बीआर गवई (CJ BR Gavai) ने टिप्पणी करते हुए कहा कि रिक्शा कोई पसंद से नहीं चलाता, यह अमानवीय प्रथा है. उन्होंने कहा कि हैंड रिक्शा खींचने वाले व्यक्ति ऐसा अपनी पसंद से नहीं, बल्कि इसलिए करते हैं. क्योंकि उनके पास कोई अन्य स्रोत या आजीविका नहीं है. सीजेआई ने कहा कि भारत जैसे देश में मानव गरिमा की मूल अवधारणा को प्रभावित करने वाली ऐसी अमानवीय प्रथा को अनुमति देना सामाजिक और आर्थिक न्याय का संवैधानिक वादे को कम करता है.

सीजेआई बीआर गवई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ मामले की सुनवाई कर रही है. सीजेआई ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजाद रिक्शा चालकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के 45 साल बाद भी माथेरान शहर में एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान को खींचने की अमानवीय प्रथा अभी भी चल रही है. सीजेआई ने कहा कि हमें खुद से यह सवाल पूछना होगा कि क्या हम सामाजिक और आर्थिक समानता के संवैधानिक वादे के प्रति सजग हैं. दुर्भावना से इसका जवाब नकरात्मक होगा.

‘रिक्शा बंद हो, लेकिन आजीविका भी बनी रहे’

उन्होंने कहा कि देश के आजादी मिलने के 78 साल बाद और संविधान बनने और नागरिकों को सामाजिक व आर्थिक न्याय का वादा करने के 75 साल बाद भी ऐसी प्रथा जारी रखना भारत की जनता द्वारा खुद से किए गए वादे के साथ विश्वासघात होगा. रिक्शा चलाने की प्रथा को तुरंत बंद कर देना चाहिए, लेकिन साथ ही यह प्रथा भी उठेगा कि यदि हम इस प्रथा को बंद कर देंगे तो उन लोगों का क्या होगा, जो अपनी आजीविका के लिए इसपर निर्भर है.

उन्होंने कहा कि इसका जवाब 1980 में ही मिल गया था. देश में 45 साल के तकनीकी विकास ने अब पर्यावरण के अनुकूल ई-रिक्शा का अविष्कार कर दिया है. कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश किए गए रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि आपके अधिकारी दबाव में आ सकते हैं, लेकिन हमारी न्यायपालिका नहीं.

महाराष्ट्र सरकार की रिपोर्ट पर कोर्ट ने जताई नाराज़गी

कोर्ट ने कहा कि माथेरान एक ऐसा हिल स्टेशन है, जहां मोटर वाहन प्रतिबंधित हैं. इस वजह से वहां हाथ से खिंचे जाने वाले रिक्शों का चलन लंबे समय से जारी है. सीजेआई ने कहा कि राज्य को हाथ से चलने वाले रिक्शा चालकों के पुनर्वास के लिए एक योजना बनानी चाहिए ताकि वे अपनी आजीविका से वंचित न रह सकें. कोर्ट ने गुजरात के केवडिया में लागू ई-रिक्शा मॉडल का हवाला दिया, जहां आदिवासी महिलाएं प्रतिदिन ई-रिक्शा किराए पर लेकर चलाती है.

बता दें कि जनवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ई-रिक्शा केवल उन हाथ-रिक्शा चालकों को दिए जाएं जो अपनी आजीविका खो चुके है. इसके बाद अप्रैल 2024 में कोर्ट ने माथेराम में ई-रिक्शा की संख्या 20 तक सीमित रखने का आदेश दिया था. वही नवंबर 2024 में कोर्ट ने लाइसेंस वितरण में गड़बड़ी पर अधिकारियों को फटकार लगाई और स्पष्ट किया था कि ई-रिक्शा का लाइसेंस सिर्फ वास्तविक रिक्शा खींचने वालों को ही मिले. और फरवरी 2025 में कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को दो सप्ताह में निष्पक्ष और पारदर्शी योजना पेश करने का निर्देश दिया था.

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-भारत एक्सप्रेस 



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