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सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ का बड़ा आदेश, अदालतें मध्यस्थता और सुलह पर 1996 के तहत मध्यस्थता फैसलों को कर सकेंगी संशोधित

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने मध्यस्थता फैसलों को संशोधित करने के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. अदालतों को सीमित परिस्थितियों में मध्यस्थता पुरस्कारों में संशोधन करने की शक्ति दी गई है.

supreme court

सुप्रीम कोर्ट के पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बड़ा फैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने 4:1 बहुमत से यह फैसला दिया है. संविधान पीठ ने कहा कि अदालतें मध्यस्थता और सुलह पर 1996 के तहत मध्यस्थता फैसलों को संशोधित कर सकती है.इसको लेकर सभी पक्षों की जिरह के बाद संविधान पीठ ने 19 फरवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

इस पीठ में सीजेआई संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. वी विश्वनाथन शामिल है. सीजेआई संजीव खन्ना ने कहा कि कोर्ट के पास कुछ परिस्थितियों में मध्यस्थ पुरस्कारों को संशोधित करने की सीमित शक्ति है. संविधान पीठ ने कहा कि निम्न परिस्थितियों में अदालतें मध्यस्थ पुरस्कारों को संशोधित कर सकती है.

संविधान पीठ में शामिल न्यायधीश और उनकी राय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निम्न परिस्थितियों में अदालतें मध्यस्थ पुरस्कारों को संशोधित कर सकती है. जब पुरस्कार अलग-अलग हो, किसी भी लिपिकीय, गणना या टाइपोग्राफिकल त्रुटि को ठीक करना हो, कुछ परिस्थितियों में पुरस्कार के बाद ब्याज को संशोधित करना हो, संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत संशोधन बहुत सावधानी से किया जा सकता है. संविधान पीठ ने कहा कि धारा 34 के तहत न्यायालय तब तक पुरस्कार में संशोधन नहीं कर सकता जब तक कि कानून द्वारा स्पष्ट रूप से अधिकृत न किया जाए, क्योंकि यह योग्यता समीक्षा करने के समान है.

याचिकाकर्ताओं और सरकार के बीच मतभेद

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अरविंद दातार ने कहा कि अदालतों के पास धारा 34 के तहत मध्यस्थ फैसलों को रद्द करने का अधिकार है. अदालतें उन फैसलों में.संशोधन भी कर.सकती है. क्योंकि यह उनके विवेकाधिकार का हिस्सा है. इसलिए अदालतों को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता, जो लिखा ही नही है. हालांकि जस्टिस केवी विश्वनाथन ने अपने फैसले में असहमति की राय दी है.

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अदालतों को मध्यस्थता निर्णयों में संशोधन करने का अधिकार है. जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि इसे विधायिका पर छोड़ दिया जाना चाहिए. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अलावा वरिष्ठ वकील अरविंद दातार, डेरियम खंबाटा, शेखर नाफड़े, रितिन राय, सौरभ कृपाल और गौरव बनर्जी ने अपना-अपना पक्ष रखा.

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-भारत एक्सप्रेस 



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