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‘तलाक-ए-हसन’ मामले की सुनवाई टली, पढ़ें सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई टाल दी है. हालांकि, कोर्ट ने इस प्रथा पर सख्त टिप्पणी करते हुए पूछा है कि क्या 2025 के आधुनिक समाज में महिलाओं के खिलाफ ऐसी प्रथा की अनुमति दी जा सकती है?

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट ने ‘तलाक-ए-हसन’ की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फिलहाल सुनवाई से इनकार कर दिया है. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि किसी अन्य दिन मामले में सुनवाई करेगी. पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस प्रथा पर नाराजगी व्यक्त करते हुए पूछा था कि क्या किसी सभ्य समाज में इसकी इजाजत दी जा सकती है? मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने संकेत दिया था कि वह तलाक-ए-हसन जैसी प्रथा को रद्द कर सकता है और इस मामले को संवैधानिक पीठ के पास भी भेज सकता है.

महिलाओं की गरिमा और कोर्ट की सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए पूछा था कि क्या 2025 जैसे आधुनिक समय में महिलाओं को कमतर दिखाने वाली प्रथा को जारी रखना उचित है. उन्होंने कहा था कि सभ्य समाज में महिलाओं की गरिमा सर्वोपरि होनी चाहिए और कोई भी धार्मिक प्रथा इस गरिमा का हनन नहीं कर सकती है. कोर्ट ने कहा था कि यदि घोर भेदभावपूर्ण व्यवहार हो रहा है तो अदालत को हस्तक्षेप करना होगा और कुछ सुधारात्मक उपाय किए जाने चाहिए क्योंकि यह प्रथा बड़े पैमाने पर समाज को प्रभावित करती है.

क्या है तलाक-ए-हसन और याचिकाओं की मांग?

तलाक-ए-हसन एक ऐसी प्रथा है जिसके तहत एक मुस्लिम पुरुष तीन महीने तक हर महीने में एक बार “तलाक” शब्द कहकर तलाक दे सकता है. तलाक पीड़िता बेनजीर हिना सहित आठ लोगों की ओर से दायर याचिकाओं में कहा गया है कि यह व्यवस्था पुरुषों को अपनी मर्जी से शादी खत्म करने का एकतरफा अधिकार देती है, जो मुस्लिम महिलाओं को असमानता की स्थिति में रखता है. याचिकाओं में यह भी दावा किया गया है कि कई इस्लामी राष्ट्रों ने इस तरह की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया है.

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आयोगों से राय और अनुच्छेद 142 का जिक्र

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मुसलमानों में प्रचलित तलाक-ए-हसन, तलाक-ए-अहसन और तलाक-ए-किनाया पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) से राय मांगी थी, ताकि प्रभावित महिलाओं और बच्चों पर इसके प्रभाव की जांच की जा सके. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर पति और पत्नी एक साथ नहीं रह सकते तो संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत तलाक दिया जा सकता है.



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