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जोजरी नदी प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: बनेंगे 2 ‘इंटीग्रेटेड कोऑर्डिनेशन ग्रुप’, 22 सितंबर को एक्शन प्लान पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान की जोजरी नदी में प्रदूषण मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए 2 इंटीग्रेटेड कोऑर्डिनेशन ग्रुप और नदियाँ पुनरुद्धार बॉडी बनाने का निर्देश दिया है.

Pollution in Rajasthan Jojari River

राजस्थान की ऐतिहासिक जोजरी (Jojari) नदी में लगातार बढ़ते घातक प्रदूषण और 20 लाख लोगों की सेहत से जुड़े मामले में स्वतः संज्ञान (Suo Motu) पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने अत्यंत कड़ा रुख अपनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए दो ‘इंटीग्रेटेड कोऑर्डिनेशन ग्रुप’ (एकीकृत समन्वय समूह) का गठन करने और राज्य में नदियों के संपूर्ण पुनरुद्धार (Rejuvenation) के लिए एक समर्पित प्रशासनिक बॉडी बनाने का निर्देश दिया है.

22 सितंबर को होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की दो सदस्यीय खंडपीठ इस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है. सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने स्पष्ट किया कि ये सभी महत्वपूर्ण निर्देश मुख्य अदालत के आदेश में शामिल किए जाएंगे तथा इनकी प्रति राजस्थान सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) शिव मंगल शर्मा और पूर्व में गठित हाई-पावर्ड कमेटी को तुरंत भेजी जाएगी.

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगामी 22 सितंबर 2026 को अगली सुनवाई करेगा. 22 सितंबर को होने वाली सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत इंटीग्रेटेड कोऑर्डिनेशन ग्रुप और हाई-पावर्ड कमेटी द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किए गए व्यापक व विस्तृत समाधान प्लान (Comprehensive Action Plan) पर गहन विचार-विमर्श करेगी.

SC की तीखी टिप्पणी

मामले की पिछली सुनवाइयों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य प्रशासन पर गहरा आक्रोश जताया था. कोर्ट ने सवाल उठाया था कि लगातार प्रशासनिक निगरानी के दावों के बावजूद स्थानीय जिला प्रशासन और राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) आखिरकार क्या कर रहे थे. जस्टिस संदीप मेहता ने राज्य सरकार के वकीलों को आड़े हाथों लेते हुए कहा था:

“यह भीषण प्रदूषण और इसके कारण 20 लाख से अधिक स्थानीय निवासियों की निरंतर प्रताड़ना व पीड़ा को नियंत्रित करने में राज्य सरकार पूरी तरह विफल रही है. जो कुछ भी जोजरी नदी में हुआ है, वह पूरी तरह से स्थानीय अधिकारियों की नाक के नीचे और उनकी मिलीभगत से हुआ है.”

अदालत ने पूर्व में चिंता जताते हुए पूछा था कि क्या इस पूरे महा-घोटाले और पर्यावरणीय अपराध की जांच सीधे केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी जाए. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट संकेत दिए थे कि वह इस मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) से भी अधिक कठोर व बाध्यकारी आदेश पारित करेगा.

सारा कानूनी कार्रवाई का ब्योरा

सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) शिव मंगल शर्मा ने राज्य सरकार द्वारा दायर विस्तृत हलफनामा कोर्ट के रिकॉर्ड पर रखवाया और पीठ को भरोसा दिलाया कि सरकार मामले में बेहद सख्त कदम उठा रही है:

SIT जांच: मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक वरिष्ठ आईपीएस (IPS) अधिकारी की अध्यक्षता में विशेष जांच टीम (SIT) गठित की जाएगी.

FIR और अधिकारियों पर गाज: प्रदूषण फैलाने वाले अवैध उद्योगों, कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) प्रबंधन और दोषी सरकारी अधिकारियों की संलिप्तता की जांच के लिए एफआईआर (FIR) दर्ज की जाएगी.

त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई: मामला प्रकाश में आते ही राजधानी जयपुर से विशेष टीम को जोधपुर भेजा गया, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दो वरिष्ठ अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspend) कर दिया गया, कई अधिकारियों के तबादले किए गए और दोषियों पर भारी ‘पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति’ (Environmental Compensation) की कार्रवाई शुरू की गई है.

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रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में बनी थी हाई-पावर्ड कमेटी

उल्लेखनीय है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश (Retired Judge) की अध्यक्षता में उच्चाधिकार प्राप्त समिति (High-Powered Committee) के गठन का आदेश दिया था. राजस्थान सरकार के वकील ने कोर्ट को अवगत कराया था कि इस मामले पर एनजीटी (NGT) ने वर्ष 2022 में भी एक विस्तृत आदेश पारित किया था, जिसके खिलाफ दाखिल सिविल अपील फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है. शीर्ष अदालत ने दोहराया कि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और राज्य सरकार को इस प्रदूषण पर पूर्ण विराम लगाने के लिए बिना किसी देरी के ठोस व स्थायी कदम उठाने होंगे.



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