सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन के निजामुद्दीन कॉलोनी में स्थित 200 वर्ष पुरानी तकिया मस्जिद को लेकर दायर उस याचिका को खारिज दिया, जिसमें महाकाल मंदिर से सटे पार्किंग स्थल के विस्तार के लिए मस्जिद को गिराए जाने को चुनौती दी गई थी.
मुआवजे के आदेश को चुनौती
जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि भूमि अधिग्रहण और सामाजिक प्रभाव आकलन से जुड़े सवाल केवल मालिक ही उठा सकते है. उन्होंने यह भी कहा कि याचिका में अधिग्रहण को नहीं, बल्कि मुआवजे के आदेश को चुनौती दी गई थी, इसलिए याचिका खारिज की गई.
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हुफेजा अहमदी ने दलील दी कि जिस आदेश के आधार पर उनकी याचिका पहले खारिज की गई थी, उसकी बुनियाद यह मानना था कि अधिग्रहण की कार्यवाही अंतिम रूप से पुष्टि हो चुकी है. इस पर अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता केवल कब्जेदार है.
कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन का आरोप
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका को खारिज कर दिया था कि याचिका दायर करने में बहुत देरी की गई है. अब कुछ नहीं हो सकता है. जस्टिस विक्रमनाथ ने कहा था कि आपने अधिग्रहण को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की थी.
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एम आर शमशाद ने कहा था कि यह 200 साल पुराना है. अब चूंकि एक अन्य धार्मिक स्थल के लिए पार्किंग की आवश्यकता है, इसलिए इसे ध्वस्त कर दिया गया है. मोहम्मद तैय्यब सहित अन्य की ओर से दायर याचिकाओं ने राज्य सरकार पर धार्मिक स्वतंत्रता से भूमि कानूनों तक कि कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया था.
मनमाने तरीके से ध्वस्तीकरण
मस्जिद को जनवरी 2025 में तोड़ा गया था, जिसे महाकाल मंदिर परिसर विस्तार का हिस्सा बताया गया था. याचिककर्ताओ के अनुसार मस्जिद को 1985 में वक्फ के रूप में अधिसूचित किया गया था और इस साल जनवरी में अवैध घोषित किए जाने और मनमाने तरीके से ध्वस्तीकरण से पहले 200 सालों तक इसका इस्तेमाल होता रहा.
इसके बावजूद राज्य सरकार ने मस्जिद सहित 257 मकानों को तोड़ दिया हैं. याचिका में कहा गया था कि इस कार्रवाई का उद्देश्य महाकालेश्वर मंदिर परिसर को ढाई हेक्टेयर से बढ़ाकर 40 हेक्टेयर करना था. राज्य सरकार के अनुसार यह ढांचा अवैध अतिक्रमण था और मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पार्किंग सुविधा विकसित करने के उद्देश्य से यह कार्रवाई की गई.
याचिका में ये भी कहा गया था कि इस विध्वंस ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991, वक्फ अधिनियम 1995 (अब एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास अधिनियम 1995) और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 का उल्लंघन किया है.
-भारत एक्सप्रेस
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