प्रतीकात्मक फोटो
सुप्रीम कोर्ट कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और भारी-भरकम मुनाफेखोरी के मामले पर आगामी 12 अक्टूबर को सुनवाई करेगा. अदालत ने हाल ही में कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के ‘प्राइज टू रिटेलर’ (खुदरा विक्रेता को मिलने वाली कीमत) और ‘मैक्सिमम रिटेल प्राइस’ (MRP) के बीच के भारी अंतर पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई है.
अदालत की तीखी टिप्पणियां और सवाल
फार्मा कंपनियों और कीमतें तय करने पर तंज: सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि फार्मा कंपनियों को इन चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता. कोर्ट ने सवाल उठाया कि हमें नहीं पता कि आखिर इन्हें इस तरह से कीमतें तय करने की अनुमति क्यों दी जाती है? यह पूरी तरह से बर्बादी है, जो साफ और स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है.
एमआरपी और खुदरा कीमत में भारी अंतर का उदाहरण: कोर्ट ने एक दवा का जिक्र करते हुए बताया कि एक कैंसर की दवा की MRP 22,437 रुपये है, जबकि रिटेलर के लिए उसकी मूल कीमत मात्र 3,520 रुपये है. इसके अलावा, सामान्य दवाओं का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा कि बिना कॉम्बिनेशन वाली साधारण स्टैटिन 40 रुपये की है, लेकिन एस्पिरिन के कॉम्बिनेशन के साथ वही 70 रुपये की हो जाती है— ऐसा कैसे हो रहा है?
कॉर्पोरेट अस्पतालों पर सख्त टिप्पणी
अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि “कॉर्पोरेट अस्पताल तो एक इंडस्ट्री (उद्योग) हैं, यह कोई जनसेवा नहीं है.” कोर्ट ने चिंता जताई कि आम आदमी को इस लूटपाट का खामियाजा क्यों भुगतना पड़े?
पूर्व की सुनवाई और याचिका से जुड़े मुख्य बिंदु
इससे पहले की सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं की आसमान छूती कीमतों को देखकर इसे मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ करार दिया था और कहा था कि कैंसर का इलाज वैसे ही मरीज और उसके पूरे परिवार के लिए अत्यधिक कठिन व संघर्षपूर्ण होता है.
याचिकाकर्ता और कानूनी पहलू
यह सुनवाई संजय कुलश्रेष्ठ और किशन चंद जैन द्वारा दायर की गई जनहित याचिकाओं पर हो रही है. याचिका में ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 की कमियों का मुद्दा उठाया गया है. याचिकाकर्ताओं के अनुसार, मौजूदा नियमों में कुछ जरूरी ‘शेड्यूल्ड ड्रग्स’ (Scheduled Drugs) की कीमतें तो तय होती हैं, लेकिन गैर-शेड्यूल्ड (Non-scheduled) दवाओं की शुरुआती कीमतों और मुनाफे पर सरकार का कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं है.
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पिछली सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने रेखांकित किया था कि कई मरीजों का इलाज ‘पीएमजेएवाई’ (PMJAY) या ‘आयुष्मान भारत’ योजना के तहत होता है, जिसके कारण इसमें आम जनता का टैक्सपेयर्स का पैसा खर्च होता है. जो दवा खुले बाजार में कम कीमत की होती है, वह रीइंबर्समेंट के जरिए ऊंचे दामों पर वसूली जाती है, जिसका सीधा बोझ सरकारी खजाने पर पड़ता है.
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