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कोर्ट राष्ट्रपति या राज्यपाल को समयसीमा में निर्णय का आदेश नही दे सकता- केंद्र सरकार

सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयक को मंजूरी देने की समय सीमा और उनके अधिकारों पर बहस जारी है. केंद्र सरकार और वरिष्ठ वकीलों ने संविधान के अनुच्छेद 200, 201, 32, 163 और 361 के दायरे पर बहस किया.

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयक को मंजूरी देने की समय सीमा तय करने के संदर्भ में राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए 14 सवालों को लेकर चल रही सुनवाई 2 सितंबर को भी जारी रहेगी. सीजेआई बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ मामले में सुनवाई कर रही है. मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि राष्ट्रपति या राज्यपाल को समयसीमा में निर्णय का आदेश नही दे सकता है.

राष्ट्रपति शासन के दायरे पर कोर्ट में बहस

उन्होंने कहा कि राज्य के पास खुद कोई मौलिक अधिकार नहीं होता, वह सिर्फ लोगों के अधिकारों की रक्षा करता है. उन्होंने कहा कि यह मामला अनुच्छेद 32 के तहत न्यायिक दायरे में नही आता है. कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि राज्यपाल की विधेयकों की देरी की समीक्षा क्यों नहीं कर सकता? पिछली सुनवाई में कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि यदि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की परिस्थितियों की जांच कर सकता है, तो वह राज्यपाल की देरी की समीक्षा क्यों नही कर सकता? एसजी मेहता ने कहा कि राष्ट्रपति शासन की घोषणा की समय-सीमा अनुच्छेद 356 में दी गई है, लेकिन उनका तर्क है कि अनुच्छेद 200 और 201 के मामले में न्यायिक रूप से समय सीमा पर तय कर राष्ट्रपति और राज्यपालों को परमादेश जारी करना गलत है.

केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि राज्य के पास मौलिक अधिकार नहीं हो सकते. कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या राज्य सरकार के आदेश पर रिट याचिका दायर की जा सकती है? इसपर एसजी मेहता ने कहा कि अनुच्छेद 32 तब लागू होता है, जब मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है. राज्य सरकार एक संवैधानिक संस्था है और उसके पास मौलिक अधिकार नहीं हो सकते. केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि राज्यपाल केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व नहीं करते. उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति यह भी जानना चाहती हैं कि संविधान के अनुच्छेद 361 का दायरा क्या है.

संसदीय शासन व्यवस्था में CM की जिम्मेदारी पर जोर

यह अनुच्छेद कहता है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने अधिकारों और कर्तव्यों के निर्वहन के लिए किसी भी अदालत के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे. जबकि तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने बी आर अंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि लोकतंत्र और संसदीय शासन व्यवस्था के सर्वोत्तम हित में मुख्यमंत्री और उनकी परिषद को राज्य के सुशासन के लिए जिम्मेदार होना चाहिए. उन्होंने कहा कि राज्यपाल केवल एक सूत्रधार हैं, हस्तक्षेप नहीं. उन्होंने कहा कि एक म्यान में दो तलवार का मामला नहीं हो सकता.

सिंघवी ने यह भी कहा कि राज्यपाल मंत्रालय को दरकिनार नहीं कर सकते.  संविधान के तहत राज्यपाल के पास ऐसे कोई कार्य नहीं है, जिन्हें वह स्वयं कर सके. राज्यपाल किसी भी विशेष परिस्थिति में मंत्रालय को दरकिनार नहीं कर सकते. सिंघवी ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 163 राज्यपाल को अपनी मंत्रिपरिषद की सलाह के विरुद्ध या उसके बिना कार्य करने का सामान्य विवेकाधिकर नहीं देता.

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