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प्रेगनेंसी और IPS ट्रेनिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र सरकार को दी नियमों पर यह खास नसीहत

Pregnancy Rules for IPS officers: सुप्रीम कोर्ट ने महिला IPS उर्वशी सेंगर की ट्रेनिंग मामले में दखल देने से इनकार कर दिया है क्योंकि 9 में से 3 हफ्ते का समय बीत चुका है. हालांकि, कोर्ट ने केंद्र को नसीहत दी कि महिलाओं के हक के नियमों से उनके अधिकार सीमित नहीं होने चाहिए और हर मामले का व्यक्तिगत स्वास्थ्य मूल्यांकन होना चाहिए.

Supreme Court
Edited by Shubhra Rai

Pregnancy Rules for IPS officers: सुप्रीम कोर्ट ने गर्भवती महिला आईपीएस अधिकारियों को प्रशिक्षण से रोकने वाले 1993 के गृह मंत्रालय के नियम को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई को बंद कर दिया है. उर्वशी सेंगर को चल रही ट्रेनिंग में शामिल करने के आदेश देने से इनकार कर दिया है.

कोर्ट ने बयान को रिकॉर्ड पर ले लिया

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 9 हफ्ते में से तीन हफ्ते की ट्रेनिंग पूरी हो चुकी है, इसलिए आप अच्छी ट्रेनिंग नही ले पाएंगी. वही कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस बयान को रिकॉर्ड पर ले लिया है, जिसमें कहा गया था कि महिला आईपीएस अधिकारी की वरिष्ठता पर कोई असर नहीं पड़ेगा. कोर्ट ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) को महिला आईपीएस की ओर से दायर मूल याचिका पर मेरिट के आधार पर फैसला लेने को कहा है. जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर की पीठ ने यह फैसला दिया है.

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि यदि कोई महिला अधिकारी चिकित्सीय रूप से पूरी तरह फिट है, तो उसे केवल गर्भवस्था या मातृत्व के आधार पर प्रशिक्षण से क्यों रोका जाए.अदालत ने केंद्र सरकार से कहा था कि 9 जुलाई तक बताए कि आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर को जून से शुरू हुए फेज II प्रशिक्षण में शामिल होने दिया जा सकता है या नहीं. जिसपर जवाब आने के बाद कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं के हित मे बनाए गए नियमों का इस्तेमाल उनके अधिकार सीमित करने के लिए नहीं किया जा सकता है.

अदालत ने यह भी कहा था कि,

सभी महिलाओं पर एक जैसा नियम लागू करना उचित नहीं है, क्योंकि हर महिला की स्वास्थ्य स्थिति अलग हो सकती है. कोई महिला प्रसव के 9 महीने बाद प्रशिक्षण के लिए फिट हो सकती है, जबकि कोई दो साल बाद भी फिट न हो. इसलिए ऐसे मामलों में एक समान नियम लागू करने के बजाए प्रत्येक मामले का व्यक्तिगत आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए. 23 अगस्त 1993 के गृह मंत्रालय के नियम के तहत यदि किसी आईपीएस प्रोबेशनर को प्रशिक्षण तत्काल रोक दिया जाता है और प्रसव के एक वर्ष बाद ही उसे दोबारा प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी जाती है.

भविष्य में ऐसे कई मामलों में यही मांग उठेगी

मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया था कि यदि एक अधिकारी को छूट दी गई तो भविष्य में ऐसे कई मामलों में यही मांग उठेगी. वही उर्वशी सेंगर की ओर से कहा गया था अतीत में कुछ महिला अधिकारियों को ऐसे मामलों में छूट दी जा चुकी है. याचिकाकर्ता उर्वशी सेंगर जो 2023 बैच की मध्य प्रदेश कैडर की आईपीएस अधिकारी हैं, ने बताया था कि उन्होंने सितंबर 2025 में बच्चे को जन्म दिया था और जून 2026 में शुरू हुए फेज II प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए खुद को चिकित्सीय रूप से फिट बताया था.

इसके बावजूद 1993 के कार्यालय ज्ञापन का हवाला देकर उन्हें प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई. दायर याचिका में कहा गया था कि आज के समय मे आधुनिक चिकित्सा और व्यक्तिगत मेडिकल मूल्यांकन को आधार बनाया जाना चाहिए, न कि मातृत्व के आधार पर सभी महिलाओं पर समान रूप से प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए. याचिका में कहा गया था कि आईपीएस अधिकारियों के लिए अब भी 1993 का पुराना नियम लागू रखना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है.

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-भारत एक्सप्रेस 



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