दिल्ली-एनसीआर देश का सबसे बड़ा रियल एस्टेट हब माना जाता है. पिछले दो दशकों में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद और फरीदाबाद में बड़े टाउनशिप और हाउसिंग प्रोजेक्ट लांच हुआ. लेकिन सपनों का इस बाजार ने अधूरे फ्लैट और कोर्ट में लंबित केसों का गढ़ बन गया है.
दिल्ली-एनसीआर की कई कंपनियां दिवालिया हो चुकी है या वित्तीय संकट का सामना कर रही है. इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि घर का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है, और केंद्र सरकार से दिवालियापन की कार्यवाही से गुजर रही संकटग्रस्त रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए वित्तपोषण प्रदान करने हेतु एक पुनरुद्धार कोष बनाने का निर्देश दिया है.
यूनिटेक के खिलाफ दायर सह आरोप पत्र
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने अपने आदेश में केंद्र सरकार से कहा है कि इसका मकसद वास्तविक घर खरीदारों के हितों की रक्षा करना होना चाहिए. जो कंपनियां दिवालिया हुई है. उनमें सुपरटेक, यूनिटेक, महागुन इंडिया, जेपी समूह और आम्रपाली सहित कई अन्य शामिल है. यूनिटेक देश की सबसे बड़ी बिल्डर कंपनियों में गिनी जाने वाली यूनिटेक पर सीबीआई और ईडी की जांच चल रही है. इसमें हजारों खरीदारों का पैसा फंसा है. यूनिटेक के खिलाफ ईडी द्वारा दायर सह आरोप पत्र में कहा गया है कि यूनिटेक समूह और उसके प्रमोटरों ने घर खरीदारों और वित्तीय संस्थानों से प्राप्त 16000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के धन का लगभग आधा हिस्सा अपने निजी इस्तेमाल और विभिन्न बेनामी कंपनियों में डाल दिया.
जांच एजेंसी ने दस्तावेज में यूनिटेक के प्रमोटर रमेश चंद्रा और शिवालिक वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड, औरम एसेट मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड, यूनिटेक बिल्ड टेक लिमिटेड जैसी संबंधित कंपनियों को आरोपी बनाया है. महागुन इंडिया को एनसीएलटी ने दिवालिया घोषित किया हुआ है. कंपनी की चार बड़ी परियोजनाएं अधूरी हैं और हजारों घर खरीदारों की मेहनत का पैसा फंसा हुआ है.
बिल्डर ने बचने के लिए अपनाया दिवालिया का रास्ता
वही सुपरटेक की बात करें तो इसे भी एनसीएलटी ने दिवालिया घोषित किया हुआ है. जिसमें 25000 लोगों का पैसा फंसा हुआ है. कई सालों से अनेक घर खरीदार बिल्डर से अपनी योजनाओं को पूरा करने की गुजारिश कर रहे थें. लेकिन बिल्डर ने अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए दिवालिया घोषित करने का रास्ता अपनाया. जेपी इंफ्राटेक को एनसीएलटी ने अगस्त 2017 में दिवालिया घोषित किया था. सुपरटेक कंपनी ने भी 80 मंजिला इमारत से संबंधित मामले में अपने आप को दिवालिया घोषित किया है. कंपनी पर बैंक ऑफ महाराष्ट्र के 700 करोड़ रुपए बकाया था.
बताया जा रहा था कि यह देश के सबसे ऊंची इमारत सुपरनोवा बना रही थी. एनसीएलटी ने इसे मंजूरी भी दे दिया था. वही आम्रपाली को 2017 में दिवालिया घोषित किया गया था. इसके अलावा एल्डीको, पारस, ओमैक्स जैसे कई मिड-साइज बिल्डर भी फंडिंग की कमी से समय पर डिलीवरी नहीं कर पा रहे है. दिवालिया घोषित हो चुकी कंपनियों में करीब चार से पांच लाख घर खरीदार प्रभावित हुए है. ये लोग कोर्ट और रेरा के चक्कर में वर्षो से लोग इंसाफ का इंतजार कर रहें है.
रेरा कानून का मकसद धोखाधड़ी को रोकना
बता दें कि रियल एस्टेट रेगुलेटरी ऑथोरिटी (रेरा) कानून लाने का मकसद बिल्डरों की मनमानी और उसकी धोखाधड़ी को रोकना था. 2016 से पहले रियल एस्टेट का सेक्टर काफी असंगठित हुआ करता था. आम आदमी को प्रॉपर्टी खरीदने में काफी परेशानियां झेलनी पड़ती थी. खरीदारों के हितों को देखते हुए सरकार 2016 में ये कानून लेकर आई. ये एक नियामक संस्था है, जो रियल एस्टेट क्षेत्र की निगरानी और विनियमन करती है, पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता को बढ़ावा देती है.
निवेशों के वकील एम एल लाहोटी ने कहा कि बहुत बड़ा फैसला है. आम्रपाली में पहली बार यह प्रश्न आया था. जेपी मामले में भी कोर्ट ने सवाल किया था. केंद्र सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने कानून बनाने को कहा था. बिल्डर ने झूठा केस आईबीसी और NCELT में झूठा केस दर्ज करा देते थे. जिससे मामला लंबा खिंच जाता था.
निवेशकों के लिए अच्छा सिंगनल
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला निवेशकों के लिए अच्छा सिंगनल है. निवेशकों के वकील अमित कुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने निवेशों की जीवन को सिक्योर करने के लिहाज से बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने समय सीमा के भीतर पजेशन देने की भी बात कही है. इससे पहले दिवालिया हो चुकी रियल एस्टेट कंपनी के बाद निवेशकों में काफी मायूसी थी कि वो अब क्या करें. पूर्व आईएएस आनंद ने यमुना एक्सप्रेसवे स्थित जेपी ग्रीन सिटी में 2014 में फ्लैट के लिए बुकिंग किया था. लेकिन अभी तक कोई फ्लैट नही मिला है. इन्होंने कहा कि इनका मामला NCELT में लंबित है और तारीख पर तारीख लग रही है.
वही एक अन्य निवेशक कैप्टन प्रतीक जैन ने कहा कि उन्होंने लगभग 9 साल पहले फ्लैट बुक किया था, लेकिन अभी तक उन्हें फ्लैट नही मिला है, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब फ्लैट मिलने की उम्मीद जगी है.
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-भारत एक्सप्रेस
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