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निजी स्कूलों के 37 लाख शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय बोर्ड गठन की मांग; सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर

देश भर के निजी स्कूलों में कार्यरत 37 लाख से अधिक शिक्षकों के लिए एक समान कल्याणकारी योजना और राष्ट्रीय बोर्ड के गठन की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है.

Supreme Court News

देशभर के निजी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के लिए एक समान कल्याणकारी योजना लागू करने और उनके हितों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत संस्थागत तंत्र बनाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है. यह याचिका अधिवक्ता दीपक प्रकाश के माध्यम से दायर की गई है, जिसमें केंद्र सरकार से मांग की गई है कि देश के सभी निजी स्कूलों के शिक्षकों के लिए एक ‘राष्ट्रीय निजी स्कूल शिक्षक कल्याण बोर्ड’ का गठन किया जाए.

निजी शिक्षकों की स्थिति और राष्ट्रीय आंकड़े

दायर याचिका में शिक्षा मंत्रालय के वर्ष 2023-24 के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि वर्तमान में देश भर के मान्यता प्राप्त निजी गैर-सहायता प्राप्त (Un-aided) स्कूलों में 37,30,047 (37.3 लाख से अधिक) शिक्षक कार्यरत हैं.

याचिकाकर्ता का तर्क है कि इतनी विशाल संख्या में शिक्षकों के होने के बावजूद उनके सामाजिक कल्याण और सुरक्षा के लिए देश में कोई समर्पित राष्ट्रीय वैधानिक तंत्र मौजूद नहीं है. विभिन्न राज्यों और अलग-अलग संस्थानों में निजी शिक्षकों के लिए सामाजिक सुरक्षा और सेवा से जुड़े नियम पूरी तरह से भिन्न हैं, जिसके कारण उन्हें समान अधिकार और सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं.

नौकरी की अनिश्चितता और सामाजिक सुरक्षा का अभाव

याचिका में इस बात पर गंभीर चिंता जताई गई है कि निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले अधिकांश शिक्षक संविदा (Contract), अस्थाई, तदर्थ (Ad-hoc), निश्चित वेतन या सालाना नवीनीकरण वाली नियुक्तियों के आधार पर काम करने को मजबूर हैं.

भविष्य की अनिश्चितता: ऐसे शिक्षकों को नौकरी के दौरान और सेवानिवृत्ति (Retirement) के बाद मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा का कोई ठोस भरोसा नहीं रहता.

सीमित दायरे वाले कानून: हालांकि, देश में कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम (ESI), कर्मचारी भविष्य निधि (EPF), उपदान भुगतान अधिनियम (Gratuity Act) और सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 जैसे कानून मौजूद हैं, लेकिन याचिकाकर्ता के अनुसार इनके तहत निजी स्कूल शिक्षकों को मिलने वाली सुरक्षा बेहद सीमित है और यह अलग-अलग पात्रता शर्तों पर निर्भर करती है.

मुख्य चिंताएं: बड़ी संख्या में निजी शिक्षकों के सामने पर्याप्त पेंशन, चिकित्सा सहायता, बीमा, दिव्यांगता से जुड़ी सुरक्षा और सेवानिवृत्ति के बाद के अन्य लाभों को लेकर हमेशा अनिश्चितता बनी रहती है.

समान जिम्मेदारी पर असमान लाभ

याचिकाकर्ता के वकीलों ने दलील दी है कि निजी स्कूलों में लगभग समान या एक जैसी शैक्षणिक जिम्मेदारियां निभाने वाले शिक्षकों को केवल उनके राज्य, संस्थान या नियुक्ति की प्रकृति के आधार पर अलग-अलग सामाजिक सुरक्षा लाभ मिलना पूरी तरह अनुचित है. वर्तमान व्यवस्था के कारण शिक्षकों के बीच गहरी असमानता पैदा हो रही है.

इसलिए याचिका के माध्यम से मांग की गई है कि केंद्र स्तर पर एक ऐसा मजबूत संस्थागत तंत्र बनाया जाना चाहिए, जो देश के सभी राज्यों में निजी शिक्षकों के लिए लागू होने वाले कल्याणकारी उपायों और नीतियों का प्रभावी ढंग से समन्वय और निगरानी (Monitoring) कर सके.



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