Ranveer Allahbadia: यू-ट्यूबर रणवीर इलाहाबादिया को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है. कोर्ट ने कहा कि रणवीर इलाहाबादिया अपना शो फिर से शुरू कर सकते हैं. जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हास्य एक ऐसी चीज है, जिसका पूरा परिवार आनंद ले सकता है. किसी को भी शर्मिंदा महसूस नहीं होना चाहिए. हर तरह की गंदी भाषा के इस्तेमाल पर प्रतिबंध नहीं है.
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कीमती है और इसकी रक्षा होनी चाहिए. हालांकि, अश्लीलता को अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंचने दिया जाना चाहिए.
रणवीर इलाहाबादिया की ओर से पेश वकील अभिनव चंद्रचूड़ ने दलील दी कि इस प्रतिबंध के कारण केवल उनका नहीं, बल्कि उनके 280 कर्मचारियों के परिवारों का जीवनयापन भी प्रभावित हो रहा है. उन्होंने कहा कि समाज दर समाज, नैतिक मानक अलग-अलग हो सकते हैं.
रणवीर इलाहाबादिया ने राहत की मांग की थी
रणवीर इलाहाबादिया ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर इंडियाज गॉट लेटेंट मामले में राहत की मांग की थी. उन्होंने अलग-अलग राज्यों में दर्ज एफआईआर को क्लब करने की भी अपील की थी.
सॉलिसिटर जनरल ने सुझाव दिया कि इस मामले को लेकर कुछ दिशा-निर्देश बनाने की जरूरत है. कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह इस मुद्दे पर अपने सुझाव दे, ताकि अनुच्छेद 19 में उल्लिखित मौलिक अधिकारों के मापदंडों को सुनिश्चित किया जा सके.
रणवीर इलाहाबादिया ने विदेश जाने की अनुमति की मांग की थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले वह जांच में सहयोग करें, उसके बाद विदेश यात्रा की अनुमति पर विचार किया जाएगा.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्होंने शो को जिज्ञासा के तहत देखा और यह अश्लील नहीं है, लेकिन पवित्रता के स्तर से परे है. उन्होंने यह भी कहा कि हंसी-मजाक और अश्लीलता में फर्क होता है, जबकि पवित्रता उससे भी एक कदम आगे जाती है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
यह मामला डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री के मानकों से जुड़ा हुआ है. इसमें यह सवाल उठाया जा रहा है कि मनोरंजन की सीमा कहां खत्म होती है. पिछली सुनवाई में कोर्ट ने रणवीर इलाहाबादिया को पासपोर्ट सरेंडर करने का निर्देश दिया था. कोर्ट ने यह भी कहा था कि संबंधित एपिसोड पर अब कोई और एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि रणवीर इलाहाबादिया और उनके सहयोगी अब यह शो नहीं करेंगे. हालांकि, याचिकाकर्ता को छूट दी गई थी कि वह महाराष्ट्र और असम पुलिस से धमकी मिलने पर जांच के दौरान सुरक्षा की मांग कर सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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