चुनाव आयोग (ECI) के कामकाज और देश के विभिन्न राज्यों में चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर छिड़ा सियासी और कानूनी घमासान अब देश की सबसे बड़ी अदालत पहुंच चुका है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत विपक्षी दलों के 13 प्रमुख नेताओं की ओर से दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई.
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग के हलफनामे पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिनों की मोहलत दे दी है. इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होने की संभावना है.
याचिकाकर्ताओं को मिला 10 दिन का समय
मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने पक्ष रखा. उन्होंने पीठ को बताया कि चुनाव आयोग का हलफनामा उन्हें कल ही प्राप्त हुआ है. ऐसे में आयोग के दलीलों और दावों का अध्ययन कर विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए कम से कम 10 दिनों के समय की आवश्यकता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को समय सीमा प्रदान की और सुनवाई 17 नवंबर तक के लिए टाल दी.
याचिका में क्या हैं आरोप?
विपक्ष के 13 प्रमुख नेताओं-जिसमें राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, दिग्विजय सिंह, संजय राउत, एम. ए. बेबी, डी. राजा, महुआ मोइत्रा, सुप्रिया सुले, सौगत राय, राकेश सिंह और शैलेंद्र मणि त्रिपाठी शामिल हैं-ने चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि:मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार आयोग के भीतर कथित तौर पर एकतरफा फैसले ले रहे हैं. चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना फैसले लेने और मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाने में अनियमितताएं बसर की जा रही हैं.आयोग के कामकाज में पारदर्शिता की कमी और संवैधानिक नियमों की अनदेखी का आरोप लगाया गया है.
चुनाव आयोग का सुप्रीम कोर्ट में पलटवार
विपक्ष के आरोपों पर चुनाव आयोग (ECI), मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों निर्वाचन आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी) ने संयुक्त रूप से सुप्रीम कोर्ट में अपना काउंटर एफिडेविट (हलफनामा) दाखिल किया है. आयोग ने याचिका में लगाए गए सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा:
सर्वसम्मत फैसले: SIR से जुड़े सभी निर्देश आयोग द्वारा सर्वसम्मति से पारित किए गए थे और एकतरफा फैसले के आरोप बेबुनियाद हैं.
संवैधानिक अधिकार: संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21 के तहत निष्पक्ष चुनाव कराने और मतदाता सूची को शुद्ध बनाए रखने का पूरा अधिकार आयोग के पास है.
दोहरी प्रविष्टियां और शुद्धता: मतदाता सूची को पारदर्शी बनाने के लिए पात्र मतदाताओं को जोड़ने और फर्जी या दोहरी प्रविष्टियों (Dual Entries/Duplicates) को हटाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.
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अधिकार क्षेत्र की सीमा पर क्या बोला ECI?
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में यह भी साफ किया है कि देश भर में संसदीय, विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनावों से पहले SIR को किसी खास समयबद्ध तरीके से अनिवार्य करने का निर्देश देना सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता. आयोग का कहना है कि यह पूरी तरह से निर्वाचन आयोग का प्रशासनिक और संवैधानिक क्षेत्राधिकार है. अब 17 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में यह तय होगा कि सुप्रीम कोर्ट विपक्ष की दलीलों और चुनाव आयोग की सफाई पर क्या रुख अपनाता है.
-भारत एक्सप्रेस
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