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हाई कोर्ट ने दी थी राहत, सुप्रीम कोर्ट ने लगाया रोक; ट्रेन में बदसलूकी करने वाले न्यायिक अधिकारी की बढ़ी मुश्किलें

ट्रेन में महिला यात्री की बर्थ के सामने पेशाब करने के गंभीर आरोपों में बर्खास्त किए गए जज की बहाली पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है.

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दिया है, जिसमें 2018 में ट्रेन में एक महिला सहयात्री की बर्थ के सामने पेशाब करने के मामले में एक जज को बहाल कर दिया था. बर्खास्त जज पर उपद्रव मचाने का भी आरोप था. यह इंदौर जबलपुर ओवरनाईट एक्सप्रेस की यह घटना है. जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने जज नवनीत सिंह यादव की बहाली पर रोक लगा दिया है.

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारी का यह घिनौना आचरण है. वह यह समझने में असमर्थ है कि हाई कोर्ट ने इस तरह के गंभीर मामले में हस्तक्षेप कैसे किया. ऐसे मामलों में बर्खास्तगी ही होनी चाहिए थी. कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी और राज्य सरकार दोनों से चार सप्ताह में जवाब देने को कहा है. जस्टिस संदीप मेहता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि वह ट्रेन के कोच में पेशाब करता है, वहां एक महिला भी मौजूद थी, यह बेहद शर्मनाक है.

हाई कोर्ट ने रद्द की थी बर्खास्तगी

यह याचिका पिछले वर्ष मई में हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा दिये गए आदेश के खिलाफ थी, जिसने सितंबर 2019 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया था और न्यायिक अधिकारी को 15 दिनों में बहाल करने का निर्देश दिया था. यादव पर आरोप है कि शराब के नशे की हालत में हंगामा किया, यात्रियों और टीटीई से बदसलूकी की और अपनी पहचान का रौब दिखाया. हालात इतने बिगड़े कि यात्रियों को एमरजेंसी चेन खींचनी पड़ी. जिसके चलते ट्रेन लेट हो गई. इतना ही नही आरोप यह भी है कि अधिकारी ने पास बर्थ पर पेशाब कर दिया. उसपर एक महिला बैठी हुई थी. शिकायतों के बाद उसे पिपरिया स्टेशन पर ट्रेन से उतार दिया गया और रेलवे एक्ट की धारा 145 के तहत मामला दर्ज हुआ.

प्रशासनिक कार्रवाई में जज को दोषी ठहराया गया

हालांकि जमानती होने के कारण उन्हें तुरंत रिहा कर दिया गया. इसके बाद जज के खिलाफ दो जांच हुई, एक आपराधिक जांच और दूसरा विभागीय जांच. आपराधिक मामले में मार्च 2019 में जबलपुर के स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट ने जज को बरी कर दिया. अदालत ने कहा कि कई अहम गवाहों ने अभियोजन का साथ नही दिया और मेडिकल रिपोर्ट में भी शराब की पुष्टि नही हुई है. जबकि विभागीय जांच में दोषी पाया गया. जिसमें जज के खिलाफ कार्रवाई हुई थी. मामला हाई कोर्ट पहुचा और हाई कोर्ट से जज को राहत मिल गई थी.

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-भारत एक्सप्रेस



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