सुप्रीम कोर्ट ने आईआईटी खड़गपुर के एक इंजीनियरिंग के छात्र और शारदा विश्वविद्यालय के एक डेंटल छात्र की आत्महत्या के मामलों में संज्ञान लिया है. कोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त खामियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अगर तुरंत एफआईआर दर्ज नहीं कि गई तो अवमानना की कार्रवाई की जाएगी. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट तलब किया है.
कोर्ट 28 जुलाई को करेगा मामले की सुनवाई
कोर्ट 28 जुलाई को इस मामले में अगली सुनवाई करेगा. कोर्ट ने कहा कि “कुछ न कुछ गड़बड़ है”. कोर्ट ने दोनों संस्थाओं से पूछा है कि क्या मामलों की सूचना समय पर पुलिस को दी गई थी? कोर्ट ने पूछा कि क्या एफआईआर दर्ज की गई और पुलिस को तुरंत सूचित किया गया? कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट अपर्णा भट्ट को एमिकस क्यूरी नियुक्ति किया और भट्ट से विस्तृत जानकारी देने को कहा है.
आईआईटी खड़गपुर के एक इंजीनियरिंग के छात्र ने की थी आत्महत्या
बात दे कि आईआईटी खड़गपुर के चौथे वर्ष के मेकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र रितम मंडल ने 18 जुलाई को आत्महत्या कर लिया था. रितम मंडल कोलकाता के रहने वाले थे और पांच साल के ड्यूल डिग्री प्रोग्राम में पढ़ाई कर रहे थे. छात्र हाल ही में दो महीने की गर्मी की छुट्टियों के बाद कैंपस में लौटे थे. इस वर्ष जनवरी से अब तक आईआईटी खड़गपुर कैंपस में इस तरह का यह चौथा मामला है. गत 12 जनवरी को इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग विभाग के तृतीय वर्ष के छात्र शाओन मल्लिक का शव फंदे से लटकती हालत में पाया गया था. वहीं ग्रेटर नोएडा के नॉलेज पार्क स्थित शारदा विश्वविद्यालय के छात्रावास में बीडीएस द्वितीय वर्ष के छात्रा ज्योति शर्मा ने आत्महत्या कर ली थी.
ज्योति शर्मा द्वारा लिखे गए सुसाइड नोट में महिला प्रोफेसर सैरी व महेंद्र पर जिम्मेदार बताया था. हालांकि पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. छात्रा ने सुसाइड नोट में पीसीपी और डेंटल मैटेरियल्स के शिक्षकों को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया और आरोप लगाया कि उन्होंने उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित और अपमानित किया, जिससे नउसे तनाव हुआ. उसने मांग की कि अगर उसकी मौत होती है तो शिक्षकों को जवाबदेह ठहराया जाए और उन्हें परिणाम भुगतने पड़े. इससे पहले कोर्ट ने आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त कर चुका है.
कोर्ट ने इन समस्याओं से निपटने के लिए निकाले मौजूदा तंत्र
कोर्ट ने इन समस्याओं से निपटने के मौजूदा तंत्र को अपर्याप्त बताते हुए रिटायर्ड जस्टिस रविंद्र भट्ट की अध्यक्षता में 10 सदस्यीय राष्ट्रीय टास्क फोर्स का गठन करने का निर्देश दिया था. कोर्ट ने देश भर के शैक्षणिक संस्थानों में आत्महत्या के विभिन्न मामलों का उल्लेख किया है. कोर्ट ने कहा था कि निजी शिक्षण संस्थानों सहित उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या की बार-बार होने वाली घटनाएं चिंताजनक है. कोर्ट ने कहा था कि हमें इस विषय में और कुछ कहने की आवश्यकता नही है, क्योंकि किसी भी अपराध की जांच पुलिस के अधिकार क्षेत्र में है.
कोर्ट ने यह भी कहा था कि छात्रों की आत्महत्या दर कृषि संकट से जूझ रहे किसानों के आत्महत्या रेट से ज्यादा हो गई है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था ऐसी कार्रवाई न केवल कानूनी बाध्यता है, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय सुनिश्चित करने के लिए नैतिक अनिवार्यता भी है. इसके साथ ही पुलिस अधिकारियों का यह दायित्व है कि वे बिना किसी देरी या इंकार के प्राथमिकी दर्ज कर ततपरता और जिम्मेदारी के साथ काम करें.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित टास्क फोर्स तैयार करेगी एक व्यापक रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित टास्क फोर्स एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करेगी. जिसमें छात्रों द्वारा आत्महत्या के प्रमुख कारणों की पहचान की जाएगी. इसमें रैगिंग, जाति आधारित भेदभाव, लिंग आधारित भेदभाव, यौन उत्पीड़न, शैक्षणिक दबाव, वित्तीय बोझ सहित धार्मिक विश्वास शामिल होंगे. कोर्ट ने यह भी कहा था कि छात्रों की सुरक्षा और भलाई की जिम्मेदारी हर शिक्षण संस्थान के प्रशासन की है.
इसलिए कैंपस में आत्महत्या जैसी कोई भी दुर्भाग्यपूर्ण घटना होने पर उचित अधिकारियों के साथ तुरंत एफआईआर दर्ज करना उनका कर्तव्य है. इसका मतलब है कि अगर कोई छात्र आत्महत्या करता है, तो कॉलेज प्रशासन को तुरंत को खबर करनी चाहिए. यह फैसला दो मृत छात्रों के माता-पिता द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर आया था, जिसमें मामले में प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर दिया गया था.
-भारत एक्सप्रेस
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