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सुप्रीम कोर्ट 28 अक्टूबर से न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता और करियर प्रगति मामले की सुनवाई करेगा

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ 28 अक्टूबर से न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता और करियर प्रगति के मामलों की सुनवाई शुरू करेगी.

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता के मामले में 28 अक्टूबर से सुनवाई शुरू करेगा. सीजेआई बी आर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस के विनोद चंद्रन की संविधान पीठ मामले में सुनवाई कर रही है. संविधान पीठ को तय करना है कि उच्च न्यायिक सेवा के संवर्ग में वरिष्ठता निर्धारित करने के मानदंड क्या होना चाहिए. संविधान पीठ सहायक और संबंधित मुद्दों पर भी विचार करेगा. संविधान पीठ ने न्यायिक अधिकारियों के करियर में प्रगति के मुद्दे पर विभिन्न पक्षों के नोडल वकील किए और सभी को 27 लिखित दलीलें दाखिल करने को कहा है.

कोर्ट ने कहा कि अदालत देश भर में निचली अदालतों के न्यायिक अधिकारियों के सामने आने वाले करियर में ठहराव से संबंधित अन्य सभी मुद्दों पर विचार करेगा. संविधान पीठ अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ के मामले में सुनवाई कर रही है. पिछली सुनवाई में कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि कई राज्यों में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के रूप में नियुक्त अधिकारी पूरे करियर में न तो प्रिंसीपल जिला जज बन पाते हैं और न ही हाई कोर्ट जज के पद तक पहुच पाते है.

करियर ग्रोथ की राह खोलने का प्रस्ताव

वही मामले की सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी सिद्धार्थ भटनागर ने कोर्ट को बताया था कि कई राज्यों में असामान्य स्थिति बन गई है, जहां 25-26 वर्ष की आयु में सेवा में प्रवेश करने वाले अधिकारी एडिशनल जिला जज के पद से ही रिटायर्ड हो जाते हैं. इससे न केवल अधिकारियों में निराशा बढ़ती हैं, बल्कि प्रतिभाशाली युवाओं को न्यायपालिका में शामिल होने से भी हतोत्साहित करती है. एमिकस क्यूरी ने सुझाव दिया था कि जेएमएफसी संवर्ग से नियुक्त जजों की पद्दोन्नति के लिए प्रिंसीपल जिला जज के पदों में कुछ प्रतिशत आरक्षण रखा जाए, जिससे करियर ग्रोथ की राह खुले.

वरिष्ठ वकील आर. बसंत ने किया विरोध

हालांकि वरिष्ठ वकील आर. बसंत ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था. उनका तर्क था कि ऐसा करने से उन योग्य उम्मीदवारों के अवसर सीमित हो जाएंगे जो जिला जज के रूप में सीधे भर्ती की प्रतीक्षा कर रहे हैं. सीजेआई गवई ने कहा था कि इस पूरे विवाद में संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है. उन्होंने कहा था कि यदि कोई अधिकारी युवा उम्र में सेवा में प्रवेश करता है और बिना उन्नति के एडिशनल जिला जज के पद से ही सेवानिवृत्त हो जाता है, तो यह उनके साथ निराशाजनक स्थिति बन जाती है. सीजेआई ने उदाहरण देते हुए कहा था कि जस्टिस सुंदरेश के एक पूर्व विधि लिपिक ने न्यायिक सेवा में प्रवेश किया था, लेकिन सीमित प्रमोशन अवसरों के चलते दो साल में ही इस्तीफा दे दिया.

ये भी पढ़ें- मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 11 नवंबर को सुनवाई करेगा

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-भारत एक्सप्रेस



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