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West Bengal IPAC Case: संवैधानिक तंत्र का टूटना कोई मामूली बात नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को टोका

Supreme Court News: बंगाल मामले में SC ने कहा कि संवैधानिक तंत्र गिरने का तर्क राष्ट्रपति शासन का आधार है. ED ने साफ किया कि वह केवल ‘कानून के शासन’ के उल्लंघन पर केंद्रित है.

Supreme Court
Vijay Ram Edited by Vijay Ram

पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित आइपैक (I-PAC) मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद गंभीर और अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘संवैधानिक तंत्र के ध्वस्त होने’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया जाना चाहिए, क्योंकि इसके परिणाम बहुत दूरगामी हो सकते हैं. न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है.

‘संवैधानिक तंत्र की विफलता’

सुनवाई के दौरान जब प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से दलीलें दी जा रही थीं, तब जस्टिस अंजारिया ने सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता से सीधा सवाल किया कि क्या ईडी यह मानती है कि बंगाल में संवैधानिक ढांचा पूरी तरह गिर चुका है. कोर्ट ने संकेत दिया कि यह एक ‘अतिवादी दृष्टिकोण’ हो सकता है. जज ने याद दिलाया कि अनुच्छेद 356 के तहत संवैधानिक तंत्र का ध्वस्त होना किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का आधार बनता है. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह के तर्कों का समाज और राजनीति पर बहुत गहरा असर पड़ता है.

ईडी ने दी सफाई

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट के सामने स्थिति साफ करते हुए कहा कि ईडी का इरादा राज्य में राष्ट्रपति शासन की स्थिति बताने का नहीं है. उन्होंने कहा कि ईडी केवल ‘कानून के शासन’ (Rule of Law) के उल्लंघन की बात कर रही है. मेहता ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 14 कानून के शासन से जुड़ा है, और इसी के आधार पर ईडी ने अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की है. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे संवैधानिक विफलता की बात नहीं कर रहे, बल्कि कानून व्यवस्था की बिगड़ी हुई स्थिति पर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं.

मालदा और नारदा कांड का जिक्र

बहस के दौरान एसजी मेहता ने राज्य की कानून व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए मालदा की एक घटना का उदाहरण दिया, जहां भीड़ ने न्यायिक अधिकारियों को घेर लिया था. इसके अलावा, उन्होंने 2019 और 2021 की घटनाओं का भी जिक्र किया. मेहता ने कहा कि जब सीबीआई ने पूर्व पुलिस कमिश्नर से पूछताछ की कोशिश की थी, तब मुख्यमंत्री खुद धरने पर बैठ गई थीं. साथ ही, नारदा मामले में जब टीएमसी नेताओं की गिरफ्तारी हुई, तब हजारों की भीड़ ने कोर्ट को घेर लिया था, जिससे न्यायाधीशों के लिए काम करना मुश्किल हो गया था.

अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि अनुच्छेद 32 के तहत इस याचिका पर किस सीमा तक विचार किया जा सकता है. फिलहाल, ईडी ने साफ कर दिया है कि उसका पक्ष केवल कानून के उल्लंघन तक सीमित है, न कि चुनी हुई सरकार को हटाने की सिफारिश करने तक.



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