भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी कर्मचारियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है. जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने यह फैसला दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया है कि जब तक किसी अधिकारी को ऊपरी अदालतों द्वारा दोषमुक्त नहीं किया जाता, तब तक उसे सेवा में बने रहने की अनुमति नही दी जा सकती है. यही कहते हुए कोर्ट ने दोषी अधिकारी की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है.
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर दोषी अधिकारी को सेवा में रहने दिया गया तो सरकारी सिस्टम की नींव कमजोर होगी और जो ईमानदारी अधिकारी है, उनका न सिर्फ अपमान होगा बल्कि उनका मनोबल भी गिरेगा. कोर्ट ने यह टिप्पणी रेलवे के एक इंस्पेक्टर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की है.
रेलवे इंस्पेक्टर की याचिका खारिज
दोषी रेलवे के अधिकारी ने दोषसिद्धि के निलंबन की मांग को लेकर याचिका दायर की थी. दायर याचिका में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा पर रोक लगाने और दोषसिद्धि के निलंबन की मांग की थी. जिससे उसकी नौकरी बच जाए. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सवाल किया कि एक भ्रष्ट सरकारी अधिकारी सेवा को क्यों बहाल किया जाए.
बता दें कि आरपीएफ में तैनात एक इंस्पेक्टर को रिश्वत लेने के मामले में गिरफ्तार किया गया था. गिरफ्तारी के बाद निचली अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट ने इंस्पेक्टर को दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनाई थी. जिसके खिलाफ दोषी इंस्पेक्टर ने गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
हाई कोर्ट ने दोषी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद सजा को निलंबित करते हुए जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था. लेकिन कोर्ट ने दोषसिद्धि की निलंबन को रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए याचिका को खारिज कर दिया है.
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-भारत एक्सप्रेस
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