Bharat Express DD Free Dish
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital

खुद को ट्रांसजेंडर कहना अब आसान नहीं! नए कानून में मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट जरूरी, सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट 4 मई को ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करेगा. यह याचिका लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और जैनब जाविद पटेल द्वारा दायर की गई है.

West Bengal, Supreme Court, TMC

ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 4 मई को सुनवाई करेगा. सीजेआई सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ सुनवाई करेगी. यह याचिका लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और जैनब जाविद पटेल की ओर से दायर की गई है. दायर याचिका में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की मान्यता, अधिकारों और संरक्षण को नियंत्रित करने वाले विभिन्न प्रावधानों में किए गए संशोधनों को चुनौती दी गई है. इस संशोधन में साल 2019 के कानून के आर्टिकल 4(2) हटाने का प्रस्ताव है. इसमें जेंडर के सेल्फ आइडेंटिफिकेशन के अधिकार का जिक्र था.

ट्रांसजेंडर कानून में बदलाव से विवाद बढ़ा

नई परिभाषा के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति जिनका संबंध किन्नर, हिजड़ा, अरावनी या जोगता जैसे सामाजिक सांस्कृतिक पहचान वाले समुदाय से है, उन्हें ट्रांसजेंडर माना जाएगा. इसके अलावा इंटरसेक्स लोगों को भी इस परिभाषा के अन्तर्गत रखा गया है. इसमें सबसे बड़ा बदलाव यह है कि यह 2019 कि तुलना में ट्रांसजेंडर पहचान को सीमित कर देती है. इसमें अब सेल्फ आइडेंटिफिकेशन वाले ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को जगह नहीं मिली है. इसके अलावा नए बिल में सजा का भी प्रावधान है, नए बिल में बच्चों को ट्रांसजेंडर बनाने पर आजीवन कारावास की सजा व 5 लाख रुपए जुर्माना का प्रावधान है.

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट अनिवार्य

वही बालिग के मामले में 10 साल तक कि सजा व दो लाख तक का जुर्माना हो सकता है. नए संशोधित बिल के मुताबिक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अब अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार नही होगा, ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आवश्यक होगी. ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों के लिए सख्त सजा हो सकती है. ऐसे में खुद को ट्रांसजेंडर मानने वाले लाखों लोग इस कैटेगरी से बाहर हो जाएंगे. 2019 के एक्ट में यह प्रावधान था कि कोई भी शख्स अपनी इच्छा से खुद को ट्रांसजेंडर घोषित कर सकता था और उसके बाद उसे डीएम से सर्टिफिकेट मिल जाता है. लेकिन अब यह व्यवस्था समाप्त हो गई है और मेडिकल टेस्ट कराना जरूरी कर दिया गया है.

मेडिकल टेस्ट के बाद ही डीएम जारी करेगा ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेट

मेडिकल टेस्ट के बाद ही डीएम किसी को ट्रांसजेंडर का सर्टिफिकेट दे पाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने नालसा बनाम भारत संघ 2014 के केस में यह फैसला सुनाया था कि खुद की पहचान मौलिक अधिकार है. कोई भी व्यक्ति यह तय कर सकता है कि वह पुरुष है, महिला है या फिर ट्रांसजेंडर है. इसके लिए किसी मेडिकल जांच की जरूरत नही है. साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय कानून सेवा प्राधिकरण से जुड़े फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता दी थी.

यह भी पढ़ें: रिलायंस ADAG केस: अमिताभ झुनझुनवाला और अमित बापना को राहत नहीं, 15 मई तक बढ़ी जेल की मियाद

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Kanya Sumangla Mission Shakti Digital