यासीन मलिक को फांसी देने की NIA की मांग वाली याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने तिहाड़ जेल से रिपोर्ट मांगी
Yasin Malik Case: आतंकी फंडिंग मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे अलगाववादी नेता यासीन मलिक की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की ओर से फांसी की सजा देने की मांग वाली याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने तिहाड़ जेल अधीक्षक से रिपोर्ट मांगी है. सुनवाई के दौरान यासीन मलिक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत में पेश नहीं हुआ. इस पर कोर्ट ने अगली सुनवाई में उसकी पेशी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई दिसंबर में होगी.
खुद अपना केस लड़ना चाहता है यासीन मलिक
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस अरुण भारद्वाज की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की. इस दौरान एनआईए की ओर से पेश विशेष लोक अभियोजक अक्षय मलिक ने अदालत को बताया कि यासीन मलिक खुद अपना पक्ष रखने की इच्छा जता चुका है. वह किसी वकील के बजाय व्यक्तिगत रूप से अदालत में बहस करना चाहता है.
पिछली सुनवाई में यासीन मलिक ने कहा था कि एनआईए की ओर से मौत की सजा की मांग वाली अपील दायर किए तीन साल हो चुके हैं. उसने दलील दी थी कि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक इस असमंजस में रखना कि उसे फांसी होगी या नहीं, मानसिक यातना जैसा है. कोर्ट ने उससे यह भी पूछा था कि क्या वह कानूनी फैसलों और दस्तावेजों के आधार पर अपना जवाब दाखिल करना चाहता है. इस पर मलिक ने विचार करने के लिए समय मांगा था.
एनआईए ने क्यों की फांसी की मांग?
एनआईए का कहना है कि यासीन मलिक ने गंभीर अपराधों में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी, जिसके बाद निचली अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई. एजेंसी का तर्क है कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए उसे मृत्युदंड दिया जाना चाहिए. पिछली सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी अदालत में यही दलील रखी थी.
याचिका में यासीन मलिक को ओसामा बिन लादेन के मामले की तरह फांसी देने की मांग की गई है. हालांकि, इस पर अंतिम फैसला अदालत को करना है.
2022 में सुनाई गई थी उम्रकैद की सजा
25 मई 2022 को पटियाला हाउस कोर्ट ने यासीन मलिक को आतंकी फंडिंग और संबंधित मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई थी. अदालत ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) की धारा 17 के तहत उम्रकैद के साथ 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था. इससे पहले 10 मई 2022 को मलिक ने अपने खिलाफ लगे आरोपों को स्वीकार कर लिया था.
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इस मामले में पहले जस्टिस अमित शर्मा ने खुद को सुनवाई से अलग कर लिया था. वह 2010 में एनआईए की ओर से अभियोजक के रूप में पेश हो चुके थे. इसके बाद मामला हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया था.
उधर, यासीन मलिक की पत्नी मुशाल हुसैन मलिक के कथित बयान को लेकर भी विवाद हुआ था. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने एक पाकिस्तानी पॉडकास्ट में यासीन को फांसी दिए जाने की स्थिति में भारत में आतंकी हमलों की धमकी देने जैसा बयान दिया था. इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है. फिलहाल, हाई कोर्ट में सबकी नजरें अगली सुनवाई और यासीन मलिक की पेशी पर टिकी हैं.
-भारत एक्सप्रेस
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