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Ganesh Chaturthi 2025: छत्रपति शिवाजी से राष्ट्रीय आंदोलन तक, जानिए क्या है भगवान गणेश उत्सव का इतिहास

गणेश उत्सव (Ganesh Utsav 2025) महाराष्ट्र से शुरू होकर पूरे भारत में एकता और उत्साह का प्रतीक बन गया है. छत्रपति शिवाजी महाराज ने सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए इसकी शुरुआत की. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बनाया.

Ganesh Chaturthi 2025

Ganesh Chaturthi 2025: गणेश चतुर्थी, जिसे गणेशोत्सव के नाम से भी जाना जाता है, भारत का एक भव्य और अत्यंत लोकप्रिय त्योहार बन चुका है. मुंबई, गोवा, पुणे सहित पूरे देश में “गणपति बप्पा मोरया!” की गूंज सुनाई देती है. यह 10 दिनों तक मनाया जाने वाला उत्सव भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है और सामाजिक एकता का प्रतीक भी बन गया है. ऐसे में चलिए हम आपको बताते हैं भगवान गणेश उत्सव का इतिहास क्या है?

भगवान गणेश को विघ्नहर्ता यानी सभी बाधाओं को दूर करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है. परंतु क्या आप जानते हैं कि यह विशाल सार्वजनिक उत्सव पहले केवल पारिवारिक अनुष्ठान था? इसकी कहानी सदियों पुरानी है और इसमें मराठा साम्राज्य, पेशवाओं और एक क्रांतिकारी नेता का दृष्टिकोण शामिल है.

गणेश चतुर्थी का सार्वजनिक रूप से उत्सव पहली बार छत्रपति शिवाजी के पूर्वज, छत्रपति विट्ठलराव, और मराठा साम्राज्य में छत्रपति शिवाजी ने इसे बढ़ावा दिया. पेशवाओं ने भी इसे अपनी प्रमुख परंपराओं में शामिल किया. पेशवाओं के शासनकाल में पुणे में यह उत्सव बड़े पैमाने पर मनाया जाने लगा, लेकिन ब्रिटिश शासन के बाद यह अधिकतर पारिवारिक स्तर पर सीमित रह गया.

19वीं सदी के अंत में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कमजोर पड़ रहा था। इसी दौरान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में पुणे में सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत की. उन्होंने महसूस किया कि ब्रिटिश सरकार धार्मिक समारोहों में हस्तक्षेप नहीं करेगी और इस उत्सव के माध्यम से राजनीतिक चर्चाओं, देशभक्ति के गीत और राष्ट्रवाद का संदेश फैलाया जा सकता है.

तिलक ने अपने अखबार केसरी और मराठा के जरिए लोगों को आह्वान किया कि वे अपने घरों से गणेश प्रतिमाओं को सार्वजनिक पंडालों में स्थापित करें. इस कदम से गणेशोत्सव केवल धार्मिक पर्व नहीं रहा बल्कि सामूहिक और सार्वजनिक आंदोलन बन गया, भारतीय संस्कृति का पुनर्जागरण और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन गया.

गणेशोत्सव का क्रांतिकारी पहलू जन आंदोलन: यह उत्सव पारिवारिक अनुष्ठान से सार्वजनिक आंदोलन में बदल गया. सांस्कृतिक पुनर्जागरण: भारतीय संस्कृति और परंपराओं को पुनर्जीवित किया. राष्ट्रवाद का प्रतीक: पंडालों में देशभक्ति के भाषण और स्वतंत्रता संग्राम का संदेश दिया गया.

आधुनिक युग में गणेशोत्सव आज गणेश चतुर्थी न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी मनाया जाता है. यह त्यौहार पर्यावरण और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक भी बन गया है. ईको-फ्रेंडली मूर्तियां: मिट्टी और बायोडिग्रेडेबल सामग्री से बनाई जाती हैं. सामाजिक संदेश: पंडाल शिक्षा, स्वच्छता और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर आधारित हैं. ग्लोबल पहचान: भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान को मजबूत किया.

उत्सव की विशेषताएँ गणेश स्थापना: भक्त अपने घरों और पंडालों में गणेश प्रतिमा स्थापित करते हैं. पूजा और आरती: 10 दिनों तक विशेष पूजा और भजन-कीर्तन होते हैं. मोदक और प्रसाद: गणेश जी को उनके प्रिय व्यंजन मोदक का भोग लगाया जाता है. सांस्कृतिक कार्यक्रम: लोक नृत्य, नाटक और सामाजिक जागरुकता कार्यक्रम आयोजित होते हैं. विसर्जन: अनंत चतुर्दशी के दिन मूर्तियों का जल में विसर्जन किया जाता है.

गणेश चतुर्थी का त्योहार धार्मिक अनुष्ठान से शुरू होकर सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बन गया. लोकमान्य तिलक की पहल ने इसे एक राष्ट्रीय मंच में बदल दिया. आज यह पर्व हमें हमारी समृद्ध विरासत, एकता और सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाता है.

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-भारत एक्सप्रेस 



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