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Kanwar Yatra 2025: रावण से जुड़ी है कांवड़ को कंधे पर रखने की परंपरा, जानें कब और कैसे हुई शुरुआत

कांवड़ यात्रा की शुरुआत रावण ने की थी जब वह गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करता था. जानिए कैसे रावण की यह श्रद्धा आज भी चल रही है परंपरा बनकर.

kanwar yatra 2025

रावण से जुड़ी है कांवड़ को कंधे पर रखने की परंपरा

हर साल सावन में शिवभक्तों की विशाल टोली गंगाजल के लिए निकलती है. सिर पर केसरिया, कंधों पर आस्था और दिल में शिव का नाम.

कांवड़ को कंधे पर रखना सिर्फ परंपरा नहीं, यह रावण द्वारा शुरू की गई उस श्रद्धा का प्रतीक है जिसमें उसने खुद गंगाजल लाकर भोलेनाथ का अभिषेक किया था.

रावण भगवान शिव का परम भक्त था. जब एक बार रावण ने कैलाश पर्वत को उठाने की कोशिश की तो शिव जी क्रोधित हो गए.

शिव जी का क्रोध देखकर रावण ने उन्हें गंगाजल से स्नान कराया. बता दें कि रावण पहली बार इसी दौरान गंगाजल को विशेष विधि से कांवड़ में भरकर लाया था.

जल लाने के लिए रावण ने कांवड़ का इस्तेमाल किया था. बस तभी से रावण के द्वारा शुरू क गई ये परंपरा आज भी चली आ रही है.

गंगाजल से भरी कांवड़ लिए भक्त तेज धूप, बारिश और थकावट की परवाह किए बिना शिवधाम की ओर बढ़ते हैं. यही होती है सच्ची तपस्या.

जब भक्त गंगाजल चढ़ाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं, तो मान्यता है कि उनके पापों का नाश होता है और उन्हें भगवान शिव की कृपा मिलती है.



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