महिषासुर का वध करतीं मां दुर्गा
Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि शक्ति की उपासना का महापर्व है. यह पर्व असत्य पर सत्य, अंधकार पर प्रकाश और आसुरी वृत्तियों पर दैवीय शक्ति की विजय का प्रतीक है. जब भी नवरात्रि और मां दुर्गा के प्राकट्य की बात होती है, तो महिषासुर के वध का प्रसंग सबसे प्रमुखता से उभरता है. परंतु कौन था महिषासुर? उसका जन्म कैसे हुआ? वह किस युग या कल्प की घटना थी और क्यों 33 कोटि देवता मिलकर भी उसे नहीं मार सके?
श्रीमद्देवीभागवत पुराण, मार्कण्डेय पुराण (दुर्गा सप्तशती) और वराह पुराण के आधार पर जानिए महिषासुर के जन्म, उसके वरदान, अत्याचार और अंत का पौराणिक एवं दार्शनिक विश्लेषण –
1. यह किस कल्प और मन्वंतर की घटना है?
पुराणों के अनुसार सृष्टि का इतिहास कल्पों और मन्वंतरों में विभाजित है. मार्कण्डेय पुराण के ‘दुर्गा सप्तशती’ के ‘वैकृतिक रहस्य’ एवं श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार देवी के चरित्र भिन्न-भिन्न कल्पों और मन्वंतरों में घटित हुए हैं.
महिषासुर वध की मुख्य कथा वर्तमान श्वेतवाराह कल्प के स्वायम्भुव मन्वंतर (प्रथम मन्वंतर) तथा सावर्णि मन्वंतर (आगामी आठवें मन्वंतर की पृष्ठभूमि) के संदर्भ में वर्णित है. राजा सुरथ और समाधि वैश्य को महर्षि मेधा ने जिस कथा का श्रवण कराया था, वह पूर्व काल की दिव्य घटना थी. काल-गणना के अनुसार यह घटना लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व दैवासुर संग्राम के उस दौर की है, जब सृष्टि में शक्ति का संतुलन बिगड़ने लगा था.
2. महिषासुर कैसे हुआ, कौन थी उसकी मां?
श्रीमद्देवीभागवत पुराण (पंचम स्कंध) के अनुसार, दिति के वंश में रम्भ और करम्भ नाम के दो परम प्रतापी असुर भाई हुए. उन्होंने संतान प्राप्ति और अमरत्व के लिए घोर तपस्या की. करम्भ ने जल में समाधि लगाई, जहाँ देवराज इंद्र ने मगरमच्छ का रूप धरकर उनका वध कर दिया. अपने भाई की मृत्यु से व्यथित होकर रम्भ ने अग्निदेव की कठोर तपस्या की और वरदान मांगा कि उसे एक ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो तीनों लोकों में अजेय हो, जिसे कोई देव, दानव या मानव न मार सके और जो इच्छानुसार रूप बदलने में सक्षम हो.
अग्निदेव से वरदान प्राप्त करने के बाद, रम्भ का संयोग एक रूपवती महिषी (भैंस) से हुआ, जो पूर्वजन्म की शापग्रस्त यक्षी थी. उसी महिषी के गर्भ से एक अत्यंत बलवान, महाकाय असुर का जन्म हुआ, जिसका आधा शरीर महिष (भैंसे) और आधा शरीर दानव का था. भैंस के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण ही उसका नाम ‘महिषासुर’ पड़ा.

3. महिषासुर का रूप, कद-काठी और राज
पुराणों में महिषासुर के स्वरूप का वर्णन अत्यंत भयावह किया गया है. वह पर्वताकार शरीर वाला, काले मेघ के समान कांति वाला, लोहे जैसी कठोर त्वचा और नुकीले विशाल सींगों से युक्त था. उसके नेत्र रक्त के समान लाल थे और उसकी फुंकार मात्र से पर्वत हिल जाते थे. वह जब अपनी पूंछ धरती पर मारता था, तो समुद्र में सुनामी उठने लगती थी.
वह केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं था. पाताल लोक पर आधिपत्य जमाने के बाद उसने संपूर्ण भू-मंडल के राजाओं को पराजित किया और अंततः अमरावती (स्वर्गलोक) पर आक्रमण कर दिया.
4. उसे क्या वरदान था और देवता क्यों विवश थे?
महिषासुर ने मंदराचल पर्वत पर जाकर पितामह ब्रह्मा जी की हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की. ब्रह्मा जी जब प्रकट हुए, तो उसने अमरता का वरदान मांगा. ब्रह्मा जी ने कहा कि जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है. तब महिषासुर ने अपने अहंकार में सोचा कि स्त्रियाँ कोमल और दुर्बल होती हैं, वे उसका क्या बिगाड़ पाएंगी. उसने वरदान मांगा:
न मे स्यान्मरणं देव सुरासुरमहोरगैः।
न नरेण न चान्येन केनचिद्भूतजातिना॥
स्त्रिया वध्यो भवेयं तु नान्यथा कमलोद्भव।
(श्रीमद्देवीभागवत पुराण, ५.३.१४-१५)
अर्थात्:
“हे कमलोद्भव! मेरी मृत्यु किसी देवता, असुर, नाग, गंधर्व अथवा किसी पुरुष जाति से न हो. संसार का कोई भी जीव मुझे न मार सके. यदि मेरी मृत्यु हो, तो केवल किसी ‘स्त्री’ के हाथों हो, अन्यथा नहीं.”
पुरुष प्रधान अहंकार में चूर होकर उसने सोचा कि कोई भी अबला नारी उसका वध नहीं कर सकती. यही वरदान उसके लिए अभेद्य कवच बन गया. भगवान शिव, भगवान विष्णु अथवा देवराज इंद्र – कोई भी पुरुष रूपी शक्ति ब्रह्मा जी के वरदान की मर्यादा के कारण उसका संहार नहीं कर सकती थी.

5. महिषासुर के अत्याचार, सदियों तक संहार
दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण) के तृतीय अध्याय के अनुसार, महिषासुर और देवताओं के बीच लगातार 100 वर्षों तक भीषण युद्ध चला:
देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा।
महिषेऽसुराणां मधिपे देवानां च पुरन्दरे॥
(दुर्गा सप्तशती, २.१)
अर्थात्:
“पूर्वकाल में देवताओं के अधिपति इंद्र और असुरों के स्वामी महिषासुर के बीच पूरे 100 वर्षों तक घोर देवासुर संग्राम हुआ.”
महिषासुर ने इस संग्राम में देवराज इंद्र को परास्त कर स्वर्ग के सिंहासन से बेदखल कर दिया. उसने अग्नि, यम, वरुण, सूर्य, चंद्र और कुबेर के समस्त अधिकार छीन लिए. देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया गया और वे सामान्य मनुष्यों की भांति पृथ्वी के वनों और कंदराओं में छिपकर भटकने लगे. उसने धर्म के अनुष्ठान, यज्ञ और वेदों के स्वाध्याय को नष्ट कर दिया. लाखों ऋषियों, गंधर्वों और प्रजाजनों को अमानवीय यातनाएं दीं.

6. मां भगवती का प्राकट्य: ‘तेजःपुंज’ से शक्ति का अवतरण
व्यथित और अपमानित होकर देवराज इंद्र ब्रह्मा जी को आगे कर भगवान शिव और भगवान श्रीहरि विष्णु के पास पहुँचे. देवताओं की करुण पुकार और महिषासुर के अत्याचार को सुनकर श्रीहरि और महादेव के मुख से प्रचंड क्रोध प्रकट हुआ.
उसी समय भगवान विष्णु, शिव, ब्रह्मा और इंद्र सहित समस्त तैंतीस कोटि देवताओं के शरीरों से एक अलौकिक दिव्य तेज निकला. वह समस्त तेज आकाश में जाकर एकाकार हो गया और पर्वताकार धधकती हुई ज्वाला के रूप में परिणत हो गया:
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा॥
(दुर्गा सप्तशती, २.१२)
अर्थात्:
“वहाँ सभी देवताओं के शरीरों से प्रकट हुआ वह अतुलनीय तेज एक स्थान पर मिल गया और वह तीनों लोकों में अपनी प्रभा बिखेरता हुआ एक परम सुंदरी ‘दिव्य नारी’ के रूप में प्रकट हुआ.”
- शिव जी के तेज से मुख बना,
- यमराज के तेज से केश,
- भगवान विष्णु के तेज से भुजाएं,
- चंद्रमा के तेज से स्तन और इंद्र के तेज से मध्य भाग बना.
समस्त देवताओं ने देवी को अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र भेंट किए: शिव जी ने त्रिशूल, विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति, वायु ने धनुष-बाण, इंद्र ने वज्र और ऐरावत का घंटा, तथा हिमालय राज ने सवारी के लिए सिंह अर्पित किया.

7. महिषासुर का संहार: देवी कहलाईं ‘महिषासुर-मर्दिनी’
मां दुर्गा के अट्टहास और सिंहनाद से त्रिलोक कांप उठा. महिषासुर ने अपनी कई अक्षौहिणी सेना के सेनापतियों — चिक्षुर, चामर, असिलोमा और बाष्कल — को भेजा, परंतु मां भगवती ने उन्हें कुछ ही समय में भस्म कर दिया.
अंततः महिषासुर स्वयं रणभूमि में उतरा. उसने अपनी मायावी शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए रूप बदलना शुरू किया — कभी वह भैंसा बन जाता, कभी मतवाला हाथी, कभी सिंह और कभी विशालकाय असुर. जब वह पुनः विकराल महिष रूप में आकर गर्जना करने लगा, तब देवी ने उस पर पाश फेंका और उसे अपने पाँव तले दबा लिया:
एवमुक्तवा समुत्पत्य सारूढा तं महासुरम्।
पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत्॥
(दुर्गा सप्तशती, ३.३७)
अर्थात्:
“ऐसा कहकर देवी उछलीं और उस महासुर पर चढ़ गईं. उन्होंने अपने पैर से उसके गले को दबा दिया और अपने त्रिशूल से उसकी छाती पर भीषण प्रहार किया.”
जैसे ही महिषासुर के मुख से उसका असली असुर रूप आधा बाहर निकला, देवी ने अपनी तीक्ष्ण तलवार से उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया.

आध्यात्मिक संदेश
नवरात्रि में महिषासुर वध का प्रसंग मात्र एक पौराणिक आख्यान नहीं है, बल्कि यह अंतःकरण की साधना का मार्ग है. महिष (भैंसा) तमोगुण, जड़ता, आलस्य, काम और अज्ञानता का प्रतीक है. जब व्यक्ति का अहंकार देवताओं (सद्गुणों) को पराजित कर देता है, तब केवल संगठित आत्म-शक्ति और मां दुर्गा की कृपा (शुद्ध चेतना) ही उस अज्ञानता रूपी महिषासुर का संहार कर सकती है.
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