Baba Garibnath Mandir: उत्तर बिहार के सुप्रसिद्ध आस्था केंद्र मुजफ्फरपुर के बाबा गरीबनाथ मंदिर में गुरु प्रदोष का पावन पर्व बड़े ही हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया गया. ज्येष्ठ पुरुषोत्तम मास की शुक्लपक्ष त्रयोदशी तिथि के इस खास मौके पर बाबा गरीबनाथ का ऐसा अलौकिक और मनमोहक महाश्रृंगार किया गया कि देखने वाले बस देखते रह गए. पूरा मंदिर परिसर रंग-बिरंगे फूलों, सुगंधित मालाओं और अनगिनत दीपों की रोशनी से झिलमिला उठा. इस अद्भुत नजारे का साक्षी बनने और बाबा का आशीर्वाद लेने के लिए सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी, जिससे पूरा माहौल शिवभक्ति के रंग में सराबोर हो गया.
पंचामृत स्नान और भव्य महाआरती
उत्सव की शुरुआत बाबा के विशेष अभिषेक के साथ हुई. मंदिर के मुख्य पुजारी अधिवक्ता बच्चा पाठक के नेतृत्व में विद्वान आचार्यों ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ अनुष्ठान शुरू किया. सबसे पहले बाबा गरीबनाथ का षोडशोपचार विधि से नियम-निष्ठा के साथ पूजन किया गया. इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से बाबा के शिवलिंग को स्नान कराया गया. गंगाजल से पवित्र स्नान के बाद बाबा का मुख्य महाश्रृंगार शुरू हुआ, जो भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा.
बाबा के दरबार को सजाने के लिए देश के कोने-कोने से गेंदा, गुलाब, रजनीगंधा और चमेली जैसे खास फूल मंगाए गए थे. विग्रह पर अबीर-गुलाल चढ़ाया गया और चारों तरफ घी के दीये जलाए गए. महाश्रृंगार के बाद जब धूप, दीप और कपूर से बाबा की भव्य महाआरती शुरू हुई, तो भक्तों के शंखनाद और तालियों की गूंज से पूरा मंदिर गूंज उठा. इस दौरान ‘रुद्राष्टकम’ और ‘लिंगाष्टकम’ के सस्वर पाठ के साथ ‘करुणा दयालु दुःख दूर करो बाबा’ जैसे पारंपरिक भजनों पर भक्त झूमते नजर आए. इस मौके पर डाबर बाबा (आशुतोष पाठक), प्रभात मालाकार, पंडित निरंतर झा सहित सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे.
जानिए मंदिर की कहानी
बाबा गरीबनाथ मंदिर का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही दिलचस्प भी है. मंदिर के पुजारी महंत अभिषेक पाठक बताते हैं कि इसका इतिहास सौ साल से भी ज्यादा पुराना है. उनके पूर्वज पीढ़ियों से यहाँ पूजा कराते आ रहे हैं. मान्यताओं के अनुसार, इस जगह पर पहले एक विशाल बरगद का पेड़ हुआ करता था. जब उस पेड़ की कटाई की जा रही थी, तब पेड़ के भीतर से अचानक बाबा स्वयं प्रकट हो गए. इस चमत्कारी घटना के बाद यहाँ उनकी पूजा शुरू हुई और धीरे-धीरे इस जगह ने एक भव्य मंदिर का रूप ले लिया.
ऐसे पड़ा ‘गरीबनाथ’ नाम
इस धाम का नाम ‘गरीबनाथ’ पड़ने के पीछे भी एक बेहद भावुक और गजब की कहानी है. कहा जाता है कि सालों पहले बाबा का एक परम भक्त, जो बहुत गरीब था, अपनी बेटी की शादी तय करने के बाद खर्चों को लेकर बेहद परेशान था. कोई रास्ता न सूझने पर वह हारकर मंदिर में ही सो गया. तभी उसके सपने में भगवान शिव आए और बोले, “जाओ, तुम्हारी बेटी की शादी अच्छे से हो जाएगी.”
वह भक्त जब हैरान-परेशान अपने घर पहुंचा, तो वहां का नजारा देखकर दंग रह गया. घर में शादी की सारी सामग्रियां और जरूरत का सामान पहले से मौजूद था. जब उसने अपनी पत्नी से पूछा कि यह सब कौन दे गया, तो पत्नी ने कहा, “आपने ही तो किसी के हाथों भिजवाया है.” भक्त समझ गया कि उसके दुख को हरने खुद भोलेनाथ आए थे. गरीबों के नाथ बनने की इसी घटना के बाद से उन्हें ‘बाबा गरीबनाथ’ कहा जाने लगा. मान्यता है कि यहाँ जो भी सच्ची श्रद्धा से मन्नत मांगता है, बाबा उसे कभी खाली हाथ नहीं भेजते.
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सुप्रसिद्ध कांवर यात्रा
बाबा गरीबनाथ धाम की महिमा ऐसी है कि हर साल यहां लाखों की संख्या में कांवड़िए जलार्पण करने पहुंचते हैं. श्रद्धालु पहलेजा घाट से पवित्र गंगाजल उठाते हैं और कठिन पैदल यात्रा करते हुए हाजीपुर के रास्ते मुजफ्फरपुर पहुंचकर बाबा का जलाभिषेक करते हैं. भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और मंदिर कमेटी हमेशा मुस्तैद रहती है. रास्ते में कांवरियों के आराम के लिए जगह-जगह शिविर लगाए जाते हैं, जहाँ सेवा दल और प्रशासन की तरफ से पानी, शरबत और चिकित्सा जैसी सुविधाएं दी जाती हैं. सुरक्षा के लिहाज से पूरे रूट और मंदिर परिसर में सीसीटीवी कैमरों से निगरानी रखी जाती है.
मुजफ्फरपुर का ‘मानसरोवर’
बाबा गरीबनाथ मंदिर से महज कुछ ही मीटर की दूरी पर स्थित ‘साहू पोखर’ अपने आप में अनोखा और अद्भुत है. मंदिर के पुजारी जितेंद्र तिवारी बताते हैं कि यह उत्तर बिहार का पहला ऐसा तालाब है, जिसके चारों तरफ मंदिर बने हुए हैं. करीब 6250 वर्ग मीटर में फैले इस पोखर का इतिहास 255 साल पुराना है. इसे साल 1754 में शिव सहाय साहू ने बनवाया था. सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसके निर्माण में जिन पत्थरों का इस्तेमाल हुआ था, उन्हें नदी मार्ग से मालीघाट तट पर आयात करके लाया गया था. 1917 में भारत आए प्रसिद्ध लेखक डॉ. स्पुनर ने भी अपनी किताब में इस ऐतिहासिक पोखर का जिक्र किया था.
स्थानीय लोग इस जगह को मुजफ्फरपुर का ‘मानसरोवर’ भी कहते हैं. इस पोखर के प्रांगण में भगवान शिव, राम-जानकी और राधा-कृष्ण के भव्य मंदिर स्थित हैं. यहाँ सालों से बहुत ही धूमधाम के साथ छठ पूजा का घाट सजाया जाता है, जहां हजारों व्रती सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं. शाम के समय लोग यहां सुकून के पल बिताने आते हैं और मंदिरों से आती भजन-कीर्तन की मधुर आवाजें यहाँ के माहौल को एकदम शांत और पवित्र बना देती हैं.
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