Bharat Express DD Free Dish
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital

निश्चल मन का दीपोत्सव – घर की सफाई से लेकर खील-बताशे तक, हर परंपरा में छिपी है जिंदगी की सीख

Diwali Special: त्योहारों की यादें सिर्फ रोशनी और मिठाइयों में नहीं, बल्कि उन मासूम सवालों में बसती हैं जो कभी हम पूछते थे और आज हमारे बच्चे पूछते हैं. जानिए घर की सफाई, खील-बताशे, सिंघाड़े और मिट्टी के दीयों के पीछे का वास्तविक सांस्कृतिक व मानवीय मर्म.

Diwali Special

Diwali Special

Diwali Special: बचपन में कभी ये सवाल हमारे हुआ करते थे, और आज जब घर के नन्हे बच्चे यही सवाल दोहराते हैं, तो हम एक पल के लिए ठिठक जाते हैं. फिर जेहन में पुरानी यादों की परतें खुलती हैं और हम खुद को अपनी ही जड़ों व परंपराओं से नए सिरे से जुड़ा पाते हैं. असल में, दिवाली सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख या रोशनी का एक दिन नहीं है; यह जीवन को संवारने, रिश्तों की धूल झाड़ने और निश्चल मन से खुशियों को गले लगाने का एक आत्मीय उत्सव है.

सफाई केवल धूल हटाने का नाम नहीं, नई शुरुआत का बहाना है

दिवाली आते ही घरों का मिजाज अचानक बदलने लगता है. अलमारियों के ऊपर जमी धूल साफ होती है, पुराने बक्से खुलते हैं और धूप में कपड़े सुखाए जाने लगते हैं. बच्चे अपनी पढ़ाई की मेज खाली होने और खिलौने समेटे जाने पर अक्सर सवाल करते हैं कि यह रोज क्यों नहीं होता?

उन्हें यह समझाना ज़रूरी है कि यह सफाई सिर्फ घर की दीवारों को चमकाने के लिए नहीं है. रोजमर्रा की अंधी भागदौड़ में जिन कोनों की तरफ हमारी नजर नहीं जाती, वे भी इस बहाने हमारे ध्यान में आ जाते हैं. पुरानी चीजों के साथ बीती हुई यादें निकलती हैं— कोई भूला हुआ खिलौना, किसी जेब से निकला पुराना पर्चा, या कोई काम जो महीनों से टल रहा था. साथ ही, घर की छंटाई में जो चीजें हमारे काम की नहीं रह जातीं, उन्हें फेंकने के बजाय किसी जरूरतमंद को दे देना हमें त्याग और संवेदना का पहला पाठ सिखाता है. घर वही रहता है, दीवारें वही रहती हैं, लेकिन इस एक सफाई से पूरे परिवेश में एक नई शुरुआत की ऊर्जा भर जाती है.

खील-बताशे और सिंघाड़ा: पूजा की थाली में दिखता है मौसम का मिजाज

बच्चों के मन में यह कौतूहल स्वाभाविक है कि पूजा में खील-बताशे और सिंघाड़ा ही क्यों चढ़ाया जाता है?

खील और बताशा: खील नए धान से तैयार होती है. भारत कृषि प्रधान संस्कृति रहा है, जहां अन्न केवल भोजन नहीं बल्कि साक्षात जीवन और आजीविका है. नई फसल के आगमन पर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए पहली उपज का भोग लगाना समृद्धि और घर में बरकत की कामना से जुड़ा है. वहीं बताशे गन्ने की मिठास के प्रतीक हैं. अन्न और मिठास का यह मेल जीवन में पोषण और सौहार्द का संतुलन दर्शाता है.

सिंघाड़े का महत्व: पानी में उगने वाला सिंघाड़ा बरसात खत्म होने और गुलाबी ठंड की शुरुआत के समय बाजारों में आता है. हमारी खानपान परंपराएं सदैव ऋतुचक्र (मौसम) के अनुकूल रही हैं. प्रकृति जब जो फल या उपज देती थी, उसे पूजा और भोजन का हिस्सा बना लिया जाता था. यह परंपरा सिखाती है कि मनुष्य को सदैव प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीना चाहिए.

गलियारे तो रोशन हैं, मगर वो बात कहां: मिट्टी के दीये का दर्शन

आजकल एक बटन दबाते ही पूरी इमारत चाइनीज या एलईडी बल्बों से जगमगा उठती है. मगर जो सुकून मिट्टी के दीये की धीमी और कंपकंपाती लौ में है, वह किसी कृत्रिम रोशनी में नहीं मिल सकता. बिजली की रोशनी आंखों को चौंधिया सकती है, लेकिन मिट्टी के दीये की लौ अंतरात्मा को छूती है. दीया जलाने से पहले उसमें तेल डालना, रूई की बाती को संवारना, फिर हथेलियों की ओट बनाकर हवा से बचाते हुए उसे जलाना और सहेजकर चौखट पर रखना—यह एक छोटा सा काम है, लेकिन इसमें धैर्य, सावधानी और एक अलौकिक आनंद छुपा है.

दीया जलाना केवल घर के किसी कोने का अंधेरा दूर करना नहीं है. यह हमारे भीतर के अहंकार, मनमुटाव, ईर्ष्या और उदासी के अंधकार को मिटाने का प्रतीक है. जब पूरा परिवार मिलकर दीये सजाता है, तो दिल के फासले अपने आप मिटने लगते हैं.

“मां पूछती है, बता ये रंग मुझ पर फबेगा”: रिश्तों की जीवंत रंगोली

दिवाली का सबसे खूबसूरत पहलू अपनों को संवरते और खुश होते देखना है. जब मां अपनी संदूक से सबसे अच्छी साड़ी निकालकर बच्चों से पूछती हैं कि ‘बता, ये रंग मुझ पर फबेगा ना?’, जब दादी पुराने डिब्बों को सहेजकर पूजा की सामग्री जोड़ती हैं, और जब भाई-बहन रंगोली के रंगों या पटाखों को लेकर हल्की नोकझोंक करते हैं, तो त्योहार अपनी पूरी जीवंतता के साथ सांस लेने लगता है. मिठाई का डिब्बा खुलते ही अपनी मनपसंद मिठाई पर पहला हक जताना, छोटी-छोटी बातों पर रूठना और फिर मान जाना—यही वो पल हैं जो उम्र भर के लिए यादों की तिजोरी में जमा हो जाते हैं.

जब चौखट छोटी पड़ जाए: खुशियां बांटने से बढ़ती हैं

दिवाली का अर्थ सिर्फ अपने आशियाने को सजाकर बैठ जाना नहीं है. जब हम अपनी चौखट लांघकर पड़ोस के उस बुजुर्ग के घर मिठाई का डिब्बा लेकर पहुंचते हैं जो अकेले रहते हैं, या जब हम किसी ऐसे बच्चे के हाथ में फुलझड़ी थमाते हैं जिसके पास नए कपड़े नहीं हैं, तब हमारी चौखट बड़ी हो जाती है और त्योहार अपनी सार्थकता पा लेता है.

बच्चों को सिर्फ यह कहकर चुप न कराएं कि आज भगवान राम चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे. उन्हें घर की सफाई में अपने साथ लगाएं, पूजा की थाली सजाने दें, उनके नन्हे हाथों से दीया जलवाएं और आंगन में टेढ़ी-मेढ़ी रंगोली खींचने दें. परंपराएं किताबों में पढ़कर नहीं, बल्कि अपनों के साथ जीकर समझी जाती हैं.

दिवाली इस बात की नुमाइश नहीं है कि किसके घर में कितनी महंगी सजावट है या किसने कितनी महंगी मिठाई खरीदी है. मिट्टी का एक दीया, थोड़े-से बताशे, आंगन में बनी टेढ़ी-मेढ़ी रंगोली और पूरे परिवार के साथ बैठकर बिताई गई एक निश्चल शाम भी दिवाली को जीवन भर के लिए यादगार बना सकती है.

भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital