Dussehra 2025: देश इस समय दशहरे के उत्सव की रंगत में डूबा हुआ है. हर साल आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव से भी जुड़ा है.
इसे विजयदशमी भी कहा जाता है, क्योंकि यह दिन अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक माना जाता है. इस साल 2 अक्टूबर 2025 को पूरे देश में धूमधाम से दशहरा मनाया जाएगा और जगह-जगह रावण दहन के भव्य आयोजन होंगे.
रावण दहन की शुरुआत कब हुई?
अक्सर यह सवाल लोगों के मन में आता है कि रावण दहन की परंपरा आखिर कब और कहां से शुरू हुई. हालांकि इसका कोई पक्का ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन कई मान्यताओं के मुताबिक सबसे पहला रावण दहन 1948 में रांची में हुआ था. उस समय रांची बिहार का हिस्सा था और वहां यह आयोजन पाकिस्तान से आए शरणार्थी परिवारों ने किया था. माना जाता है कि यहीं से रावण दहन की परंपरा धीरे-धीरे अन्य राज्यों तक पहुंची.
दिल्ली में पहली बार 17 अक्टूबर 1953 को रामलीला मैदान में रावण दहन किया गया था. तब से लेकर आज तक यह परंपरा राजधानी समेत पूरे देश में एक बड़े त्योहार का रूप ले चुकी है.
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विजयदशमी का महत्व
दशहरे को विजयदशमी इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह नवरात्र के नौ दिनों की समाप्ति के बाद दशमी तिथि को आता है. धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने अहंकारी रावण का वध किया था और माता दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था. यानी यह दिन दो-दो विजय की गवाही देता है – एक अधर्म पर धर्म की और दूसरी असुरता पर देवी शक्ति की.
‘विजयदशमी’ का अर्थ ही है ‘विजय का दसवां दिन’. यही कारण है कि इस दिन लोग रावण का पुतला जलाकर यह संदेश देते हैं कि चाहे अन्याय, अत्याचार या अहंकार कितना भी बड़ा क्यों न हो, अंत में जीत सच्चाई और अच्छाई की ही होती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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