Bharat Express DD Free Dish
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital

आडंबरी गुरुओं पर करारा तमाचा! ‘हनुमान अंश’ ने खोला सच, जानिए कौन है असली और फरेबी संत?

Hanuman Ansh Movie: ‘हनुमान अंश’ फिल्म ने याद दिलाए नीब करौरी बाबा और ब्रज के सच्चे संतों के प्रसंग. जानिए क्यों आज के दौर में आडंबरी गुरुओं से बचकर सच्चा संत पहचानना जरूरी है.

फिल्म 'हनुमान अंश' ने दिलाई बाबा नीब करौरी और ब्रज के विरक्त संतों की याद.

Hanuman Ansh Movie: बाबा नीब करौरी के जीवन के पूर्वार्ध पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने देश-विदेश के सनातनधर्मियों के दिलों को गहराई से छुआ है. इस फिल्म को देखते समय लेखक की भावनाएं उमड़ पड़ीं, क्योंकि उन्हें पिछले 28 वर्षों में बरसाना के श्री रमेश बाबा, श्री विनोद बाबा, पूज्य प्रेमानंद जी महाराज और संत माता अमृतानंदमयी जैसी महान आत्माओं का सानिध्य प्राप्त हुआ है. सच्चे संतों की सहजता, दरिद्र नारायण के प्रति करुणा और अमीर-गरीब में बिना भेद किए अहैतुकि कृपा करने का भाव ही उनके अलौकिक जीवन की वास्तविक पहचान है.

इस आलेख में सच्चे संतों की निश्छल भक्ति और वर्तमान समय में सनातन धर्म के नाम पर बढ़ रहे व्यावसायिक आडंबर के बीच के अंतर को बड़े ही प्रभावी ढंग से उजागर किया गया है. जहां एक ओर रमेश बाबा और नीब करौरी बाबा जैसे संतों ने सादगी से रहकर ब्रज सेवा और जन कल्याण किया, वहीं दूसरी ओर आज सोशल मीडिया और मंचों पर ‘धर्म के ठेकेदार’ और डिजाइनर वस्त्र पहनकर खुद को चमकाने वाले स्वयंभू गुरुओं की भरमार है. लेखक ने महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए चेतावनी दी है कि बिना सोचे-समझे गुरु बनाने से बचना चाहिए और केवल वहीं आस्था रखनी चाहिए जहां पहुंचकर भौतिक इच्छाएं समाप्त हो जाएं.

‘हनुमान अंश’ फिल्म और संतों के सादगी भरे सानिध्य का अनुभव

बाबा नीब करौरी के शुरुआती जीवन पर बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ को देखते हुए आंखें नम होना स्वाभाविक है. बरसाना के विरक्त संत श्री रमेश बाबा से वर्ष 1998 में हुई पहली मुलाकात का दृश्य आज भी जीवंत है, जब वे मानगढ़ की पहाड़ी पर फटी बोरियों को भिगोकर खिड़कियों पर टांगे एक खंडरनुमा कमरे में रहते थे. उन्होंने सीख दी थी कि भगवान दीनबंधु हैं, वीआईपीनाथ नहीं. संतों का जीवन हमें सिखाता है कि ब्रज सेवा और अध्यात्म की शुरुआत अपने भीतर दीनता और फकीरी लाने से ही संभव होती है.

सच्चा संत न पात्रता देखता है, न धन-वैभव की चाह रखता है

बरसाना की पीली पोखर के श्री विनोद बाबा, गोवर्धन के सियाराम बाबा, वृंदावन के कृपाविलास वाले महाराज और प्रेमानंद जी महाराज जैसे संतों का जीवन इस बात का प्रमाण है कि संत का हृदय मक्खन की तरह कोमल होता है. महाराष्ट्र की चर्चित पुलिस अधिकारी मीरा बोरवांकर का श्री विनोद बाबा के सामने घंटों स्तब्ध बैठकर शांत हो जाना यह दर्शाता है कि संतों की कृपा अनायास ही बरसती है. जैसे बादल बिना बताए किसान के खेत पर पानी बरसा देते हैं, वैसे ही सच्चे संत हमारी पात्रता देखे बिना हम पर वात्सल्य और कृपा उड़ेलते हैं.

धर्म के नाम पर बढ़ता व्यापार और आडंबरी ‘गुरुओं’ का सच

दुर्भाग्य से आज के समय में रंग-बिरंगे डिजाइनर वस्त्र पहनकर, सरकारी सुरक्षा में राजाधिराज की तरह व्यवहार करने वाले और खुद को ‘परम श्रद्धेय’ प्रचारित करने वाले स्वयंभू संतों और कथावाचकों की बाढ़ आ गई है. ये लोग मोह-माया त्यागने का उपदेश खुद वैभव में रहकर देते हैं. श्रीमद्भगवद्गीता के 18वें अध्याय के 61वें श्लोक के अनुसार ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं, इसलिए उनसे कुछ बोलकर मांगने की जरूरत नहीं होती. जिस गुरु के सम्मुख बैठकर आपकी भौतिक कामनाएं समाप्त हो जाएं और आध्यात्मिक जिज्ञासा जगे, वही सच्चा संत है.

महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की सीख: ‘पानी पीजिए छान कर, गुरु कीजिए जान कर’

थोक में शिष्य बनाने और धर्म का व्यापार करने वाले स्वयंभू गुरुओं के लिए महाप्रभु वल्लभाचार्य जी का प्रसंग एक बड़ी सीख है. 500 वर्ष पूर्व जब महाप्रभु ने जंगल में हज़ारों चींटियों द्वारा खाए जा रहे एक अजगर को देखा, तो उन्होंने बताया कि वह पूर्व जन्म में एक ऐसा गुरु था जिसने हज़ारों लोगों को दीक्षा तो दी लेकिन किसी का उद्धार न कर सका. वही शिष्य अब चींटियां बनकर उसका शरीर खा रहे हैं. इसलिए सच्चे संत को पहचानकर ही जीवन में गुरु धारण करना चाहिए, क्योंकि सच्चा संत आपसे कुछ मांगता नहीं बल्कि आपका कल्याण करता है.

यह भी पढ़ें-आज पितृ पक्ष की द्वितीया श्राद्ध, पंचांग में जानें क्या कहती है ग्रहों की चाल

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Kanya Sumangla Mission Shakti Digital