Indira Ekadashi Pitru Paksha: पितृपक्ष (श्राद्ध पक्ष) का सबसे पावन और सर्वफलदायी दिन यानी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी आज मनाई जा रही है. सनातन परंपरा में यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश अपने पूर्वजों के मोक्ष के लिए गया जी (बिहार), काशी या प्रयागराज जाकर पिंडदान और तर्पण करने में असमर्थ है, तो वह केवल इस एक एकादशी का पूर्ण विधि-विधान से व्रत रखकर अपने पितरों को यमलोक की भयानक यातनाओं से मुक्ति दिला सकता है. यही वजह है कि आज मंदिरों में तर्पण करने वालों का सैलाब उमड़ा हुआ है.
जानिए पूरी पौराणिक कथा(Indira Ekadashi Pitru Paksha)
इंदिरा एकादशी के महात्म्य की पौराणिक कथा सतयुग की ‘माहिष्मती पुरी’ के धर्मनिष्ठ राजा इंद्रसेन से जुड़ी है. राजा के पिता अपने पूर्व जन्म के कुछ अनजाने पाप कर्मों के कारण यमलोक में यातनाएं भोग रहे थे. देवर्षि नारद ने यमलोक से आकर राजा इंद्रसेन को संदेश दिया कि यदि वे आश्विन कृष्ण एकादशी का व्रत रखें और उसके पुण्य का फल अपने स्वर्गीय पिता को दान कर दें, तो उनके पिता को तुरंत यमराज के दंड से मुक्ति मिल जाएगी. राजा के व्रत दान करते ही आकाश से पुष्प वर्षा हुई और उनके पिता सीधे वैकुंठ धाम चले गए.
क्या सचमुच गया जी जाने जितना मिलता है फल?
काशी और हरिद्वार के प्रकांड ज्योतिषियों व धर्मगुरुओं के अनुसार, सनातन धर्म बेहद व्यावहारिक और करुणामय है. जो लोग शारीरिक अस्वस्थता, धन की भारी कमी या विदेश में होने के कारण बिहार के ‘गया जी’ जाकर फल्गु नदी के तट पर पिंडदान नहीं कर पाते, उनके लिए इंदिरा एकादशी का व्रत एक ‘महा-शॉर्टकट’ या आध्यात्मिक सब्सिडी की तरह काम करता है. इस दिन भगवान विष्णु के ‘हृषिकेश’ स्वरूप की पूजा करने से कुल की सात पीढ़ियों के पितरों का सीधा उद्धार होता है.
आज तर्पण और ब्राह्मण भोजन का सबसे सटीक मुहूर्त
शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन दोपहर के समय पितरों के नाम धूप, दीप, तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराने का विधान है. ज्योतिषविदों के मुताबिक आज तर्पण के 3 सबसे शुभ काल हैं:
कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक (तर्पण की शुरुआत के लिए सर्वश्रेष्ठ)
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:33 बजे से दोपहर 01:20 बजे तक
अपराह्न काल (मुख्य तर्पण समय): दोपहर 01:20 बजे से दोपहर 03:40 बजे तक
कैसे करें इंदिरा एकादशी की सरल पूजा विधि?
दशमी की रात का नियम: एकादशी से एक दिन पहले दशमी की शाम को सूर्यास्त के बाद भोजन न करें.
संकल्प और तर्पण: एकादशी के दिन सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें. दोपहर के समय दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके काले तिल, कुश और जल से पितरों का तर्पण करें.
पंचबलि भोग: तर्पण के बाद भोजन बनाकर देव, गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों के लिए ‘पंचबलि’ निकालें.
दान का महत्व: समर्थ अनुसार ब्राह्मणों को फल, वस्त्र, अन्न और दक्षिणा देकर सम्मानित करें.
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पितृदोष से कैसे मिलेगी हमेशा के लिए मुक्ति?
विष्णु पुराण के अनुसार, इंदिरा एकादशी (Indira Ekadashi Pitru Paksha) के दिन भगवान शालिग्राम की तुलसी पत्रों से पूजा करने और ‘विष्णु सहस्रनाम’ का पाठ करने से जन्मों-जन्मों का ‘पितृदोष’ समाप्त हो जाता है. यदि आपकी कुंडली में पितृदोष की वजह से तरक्की रुकी हुई है, विवाह में बाधाएं आ रही हैं या घर में क्लेश रहता है, तो आज के दिन किया गया यह व्रत और दान आपके परिवार में सुख, समृद्धि और शांति का नया सवेरा लेकर आएगा.
-भारत एक्सप्रेस
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