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Kada Dham : आस्था का प्राचीन शक्ति केंद्र, नवरात्र पर उमड़ रही है भक्तों की भीड़

Kada Dham शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है और मान्यता है कि मां शीतला देवी को पुत्र देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।

Kada Dham

Sheetla Mata Mandir Kada Dham

Kada Dham : उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में सिराथू के पास स्थित कड़ा धाम शीतला माता का मंदिर देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों में गिना जाता है. इक्यावन शक्तिपीठों में से एक यह धाम श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विश्वास का केंद्र है. आषाढ़ महीने की सप्तमी और अष्टमी को यहां हर साल भव्य मेला आयोजित होता है, जो सात दिनों तक चलता है. इस मेले में पूर्वांचल के जिलों के अलावा देश के विभिन्न प्रांतों से लाखों भक्त मां शीतला के दर्शन और पूजन के लिए आते हैं. नवरात्र में भी शीतला देवी के दर्शन के लिए भारी भीड़ उमड़ रही है, सुबह से रात 10 बजे तक भक्त लंबी लंबी कतारें में लगकर कई घंटों में माता के दर्शन कर पा रहे हैं.

भक्तों की होती है मनोकामना पूरी

Kada Dham शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है और मान्यता है कि मां शीतला देवी को पुत्र देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है. श्रद्धालु मंदिर परिसर स्थित शीतल कुंड को जल, दूध, फल और मेवों से भरवाते हैं और विश्वास करते हैं कि ऐसा करने से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. नवरात्रि के समय यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. मां शीतला को पूर्वांचल की अधिष्ठात्री देवी भी कहा जाता है.

सती का हाथ गिरने से बना शक्तिपीठ

सदियों से कड़ा धाम शक्ति उपासना का केंद्र रहा है. पुराणों के अनुसार, जब भगवान शिव की पत्नी सती ने अपने पिता दक्ष के अपमान से आहत होकर यज्ञ कुंड में आत्मदाह कर लिया, तो शोक और क्रोध से व्याकुल शिव सती का शव लेकर तीनों लोकों में विचरण करने लगे. इस दृश्य से सारा ब्रह्मांड भयभीत हो उठा. तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 हिस्सों में विभाजित किया.

जहां-जहां ये अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई. कड़ा धाम का महत्व इसलिए है क्योंकि यहां सती का हाथ गिरा था. कराकोटम जंगल में गिरे इस अंग के कारण इस स्थान का नाम “करा” पड़ा, जो समय के साथ “कड़ा” कहलाने लगा. इसी स्थान को आज पूरा देश कड़ा धाम के नाम से जानता है.

Kada Dham द्वापर युग से आज तक

मान्यता है कि द्वापर युग में पांडव पुत्र युधिष्ठिर अपने वनवास काल के दौरान कड़ा धाम आए थे. उन्होंने यहां गंगा तट पर शीतला देवी का मंदिर बनवाया और महाकालेश्वर शिवलिंग की स्थापना की. आज यह मंदिर अपने भव्य स्वरूप में भक्तों को आकर्षित करता है. मंदिर में स्थित मूर्ति में मां शीतला गर्दभ पर विराजमान हैं.

मान्यता यह भी है कि चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यदि भक्त पूरी श्रद्धा से मां शीतला की पूजा करें तो नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है. ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो Kada Dham मंदिर लगभग 1000 ईस्वी में निर्मित हुआ था.

संत मलुखदास और Kada Dham

Kada Dham केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि संत परंपरा से भी जुड़ा रहा है. प्रसिद्ध संत मलुखदास (1631–1739 ईस्वी) का जन्म यहीं हुआ था। उनका आश्रम और समाधि आज भी यहां मौजूद है. संत मलुखदास देवी कड़ा के अनुयायी थे और गुरु तेग बहादुर के साथ उन्होंने कई महत्वपूर्ण विषयों पर संवाद भी किए थे.

Kada Dham तक पहुंचने का मार्ग

कड़ा धाम शीतला माता मंदिर तक पहुंचना सरल है. रेल मार्ग से आने वालों के लिए सिराथू निकटतम रेलवे स्टेशन है, जो मंदिर से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. बस से यात्रा करने वाले श्रद्धालु सैनी तक पहुंच सकते हैं, जहां से मंदिर मात्र 8 किलोमीटर दूर है. रेलवे स्टेशन और सैनी दोनों स्थानों से टैक्सी या ऑटो आसानी से उपलब्ध होते हैं.

हवाई मार्ग से आने वाले यात्रियों के लिए प्रयागराज निकटतम हवाई अड्डा है, जिसकी दूरी लगभग 70 किलोमीटर है. प्रयागराज देश के कई प्रमुख शहरों से सीधा जुड़ा हुआ है, जिससे श्रद्धालुओं को कड़ा धाम पहुंचने में सुविधा होती है.

भारत एक्सप्रेस 



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