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क्यों दी गई थी मासूम बच्चे की बलि? सकट चौथ पर पढ़ें कुम्हार और बुढ़िया माई की वो कहानी जिसने संतानों को दिया जीवनदान

सकट चौथ का व्रत बिना कथा के अधूरा माना जाता है. आज के दिन पढ़ी जाने वाली कुम्हार और संकटहर्ता गणेश की यह कहानी न केवल श्रद्धा बढ़ाती है, बल्कि बच्चों पर आने वाले संकटों को भी दूर करती है.

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Sakat Chauth Vrat Katha: आज यानी 6 जनवरी 2026 को पूरे देश में सकट चौथ का त्योहार बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है. माताओं के लिए यह दिन बहुत बड़ा होता है, क्योंकि वे अपनी संतान की लंबी उम्र, उनके बेहतर स्वास्थ्य और जीवन की तरक्की के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. लेकिन हिंदू धर्म में किसी भी व्रत का फल तब तक अधूरा माना जाता है, जब तक उसकी पौराणिक कथा न सुनी जाए. शास्त्रों की मानें तो सकट चौथ के दिन भगवान श्री गणेश की पूजा के बाद ‘सकट चौथ व्रत कथा’ का पाठ करना अनिवार्य है.

ऐसी अटूट मान्यता है कि जो माताएं पूरी श्रद्धा से इस कथा को सुनती या पढ़ती हैं, उनके बच्चों पर आने वाली हर मुसीबत को विघ्नहर्ता स्वयं हर लेते हैं. आइए जानते हैं आखिर क्या है वह कहानी, जो इस दिन को इतना खास बनाती है.

कुम्हार की भट्टी और चमत्कारिक बालक

सकट चौथ को लेकर जो सबसे लोकप्रिय कथा सुनाई जाती है, वह हमें एक कुम्हार और एक बुढ़िया माई के पास ले जाती है. पौराणिक कहानियों के अनुसार, बहुत समय पहले एक नगर में एक कुम्हार रहता था. उसने एक बार मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए भट्टी (आवा) लगाई, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी बर्तन पक नहीं रहे थे. हताश होकर वह राजा के पास पहुँचा. राजा ने जब ज्योतिषियों और पंडितों से सलाह ली, तो उन्होंने एक बेहद डरावना समाधान बताया. पंडितों ने कहा कि ‘जब भी आवा लगाया जाए, तब एक बच्चे की बलि देनी होगी, तभी बर्तन पकेंगे.’

राजा के डर से नगर में बलि की प्रक्रिया शुरू हो गई. एक दिन एक गरीब बुढ़िया के इकलौते बेटे की बारी आई. बुढ़िया का वही एक सहारा था. उस दिन इत्तेफाक से सकट चौथ का दिन था. बुढ़िया ने रोने के बजाय बप्पा पर भरोसा जताया. उसने अपने बेटे को गणेश जी का प्रतीक यानी एक ‘सुपारी’ और थोड़े ‘तिल’ दिए और कहा- “बेटा, घबराना मत, संकटहर्ता गणेश जी का ध्यान करना, वही तेरी जान बचाएंगे.”

जब आग के बीच से मुस्कुराता हुआ निकला बच्चा

बच्चे को जलती हुई भट्टी (आवे) में बिठा दिया गया. पूरी रात वह बुढ़िया भगवान गणेश के सामने बैठकर प्रार्थना करती रही और उनके मंत्रों का जाप करती रही. अगली सुबह जब कुम्हार ने अपना आवा खोला, तो नजारा देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं. न केवल बर्तन पूरी तरह पक चुके थे, बल्कि बुढ़िया का बेटा भी पूरी तरह सुरक्षित और जीवित बैठा था. सबसे बड़ा चमत्कार तो यह हुआ कि उस आवे में पहले जिन बच्चों की बलि दी गई थी, वे भी जीवित होकर बाहर आ गए.

नगर में चारों तरफ बप्पा के जयकारे लगने लगे. तभी से यह परंपरा शुरू हुई कि माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए ‘तिलकूट चौथ’ या ‘सकट चौथ’ का व्रत करने लगीं.

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क्यों जरूरी है इस कथा का पाठ?

सकट चौथ का सीधा सा अर्थ है- संकटों को काटने वाली चतुर्थी. आज के दौर में भी यह कथा हमें सिखाती है कि मुसीबत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अगर आपका विश्वास और भक्ति अटल है, तो ईश्वर कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लेते हैं. इस कथा को सुनने से मन को शांति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है.

आज शाम को जब आप चंद्रोदय के बाद अर्घ्य दें, तो परिवार के साथ बैठकर इस कथा का पाठ जरूर करें.

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-भारत एक्सप्रेस



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