Dussehra 2025: हर साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर देशभर में विजयादशमी यानी दशहरे का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है. यह दिन अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का अंत किया था. इस शुभ अवसर पर पूरे देश में रावण दहन की परंपरा (Ravan Dahan 202५ Shubh Muhurat)निभाई जाती है. वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में एक मंदिर ऐसा भी है, जहां दशहरे के दिन रावण की पूजा-अर्चना की जाती है. यह परंपरा न सिर्फ अनोखी है, बल्कि पिछले डेढ़ सौ साल से ज्यादा वक्त से चली आ रही है.
कानपुर के शिवाला इलाके में स्थित इस मंदिर को दशानन मंदिर के नाम से जाना जाता है. साल 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने इसकी स्थापना की थी. वे भगवान शिव के परम भक्त माने जाते थे और रावण को शक्ति और विद्या का प्रतीक समझते थे. यही कारण है कि उन्होंने रावण की प्रतिमा स्थापित कर इस अनूठे मंदिर का निर्माण कराया. मंदिर की खासियत यह है कि इसके कपाट पूरे साल बंद रहते हैं और केवल दशहरे के दिन ही खोले जाते हैं. इस दिन सुबह से ही भक्तों की लंबी कतार लग जाती है. लोग बारी-बारी से दशानन की प्रतिमा के दर्शन करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं.
भक्त करते हैं रावण की आरती
विजयदशमी के दिन यहां विशेष श्रृंगार और पूजन का आयोजन होता है. भक्त तेल का दीपक जलाकर और तरोई के फूल चढ़ाकर रावण की आरती करते हैं. मान्यता है कि रावण भगवान शिव का प्रिय भक्त थे और उसे कई शक्तियां प्राप्त थी. उनकी पूजा करने से बुद्धि बल की प्राप्ति होती है.
मंदिर के पुजारी पंडित राम बाजपेई बताते हैं, ‘लोग अक्सर हमसे पूछते हैं कि रावण की पूजा क्यों होती है. हम उनकी पूजा उनकी विद्वता के कारण करते हैं. वे असाधारण पंडित और महाज्ञानी थे. इसलिए हम लोग उनकी विद्वता का सम्मान करते हैं. साथ ही दशहरे की शाम हम अहंकार रूपी रावण का दहन करते हैं, ताकि समाज से अभिमान खत्म हो.
यही नहीं, उन्होंने कहा कि’ हम लोग इनका जन्मदिन भी मनाते हैं, क्योंकि अश्वनी माह के शुक्ल पक्ष में इनका जन्म भी हुआ था, इसलिए हम लोग इनका जन्मदिन भी मनाते हैं और शाम को इनका पुतला दहन भी करते हैं.’
देश का सबसे अनोखा मंदिर
कानपुर का यह दशानन मंदिर दशहरे की भीड़-भाड़ और रावण दहन की परंपरा के बीच एक अलग धार्मिक परंपरा को जीवित रखे हुए है. जहां एक ओर पूरे देश में रावण दहन किया जाता है, वहीं इस मंदिर में उसकी विद्वता और ज्ञान की पूजा होती है.
शाम को प्रतिमा के सामने विशेष पूजा के बाद पुतला दहन भी किया जाता है, जिसे रावण के अहंकार का अंत माना जाता है. इस तरह कानपुर का यह मंदिर विजयादशमी पर श्रद्धा और परंपरा का अद्वितीय संगम बन जाता है, जहां भक्त रावण की पूजा कर ज्ञान और शक्ति की कामना करते हैं, और शाम को उसके अहंकार का दहन कर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते हैं.
-भारत एक्सप्रेस
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