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harish rana case

Supreme Court of India के फैसले के बाद मुंबई में इच्छामृत्यु को लेकर जागरूकता बढ़ी है, हालिया खबर है कि BMC को 75 आवेदन मिले. हरीश राणा केस के बाद लोग ‘लिविंग विल’ बनाकर गंभीर स्थिति में इच्छामृत्यु की अनुमति मांग रहे हैं...

गाजियाबाद के हरीश राणा, जो पिछले 11 सालों से कोमा में थे, अब सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि उस बड़े सवाल को भी उठाता है कि जब जीवन केवल कष्ट बन जाए, तो क्या गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार होना चाहिए। AIIMS में डॉक्टरों की निगरानी में तय मेडिकल प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट हटाया जा रहा है और मरीज को दर्द से राहत देने वाली देखभाल दी जा रही है। परिवार की सहमति और कोर्ट की मंजूरी के बाद ही यह कदम उठाया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया बेहद संवेदनशील और मानवीय आधार पर की जाती है.

गाजियाबाद के हरीश राणा (Harish Rana) मामले में पड़ोसी ने बताया कि उनके पिता अशोक राणा ने ढाई साल पहले अंगदान और देहदान की प्रक्रिया के बारे में जानकारी ली थी. परिवार चाहता था कि बेटे के जाने के बाद भी उसके अंग किसी जरूरतमंद को जीवन दे सकें.

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 13 साल के लंबे इंतजार के बाद गाजियाबाद के हरिश राणा को मिली इच्छामृत्यु की अनुमति. जानिए क्या है 'पैसिव यूथेनेशिया' और 'लिविंग विल' का वो कानून, जिसने अरुणा शानबाग केस से लेकर आज तक भारत में मौत के अधिकार की परिभाषा बदल दी.

सुप्रीम कोर्ट ने 12 वर्षों से कोमा जैसी स्थिति और 100% विकलांगता (क्वाड्रिप्लेजिया) से जूझ रहे 31 वर्षीय हरीश राणा की इच्छामृत्यु (Euthanasia) याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है.