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मौत का अधिकार या कानूनी पहेली! आखिर क्या है इच्छामृत्यु और भारत में इसके प्रावधान? Explainer

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 13 साल के लंबे इंतजार के बाद गाजियाबाद के हरिश राणा को मिली इच्छामृत्यु की अनुमति. जानिए क्या है ‘पैसिव यूथेनेशिया’ और ‘लिविंग विल’ का वो कानून, जिसने अरुणा शानबाग केस से लेकर आज तक भारत में मौत के अधिकार की परिभाषा बदल दी.

What is Euthanasia and its legal procedure in India

ये इमेज एआई द्वारा बनाई गई है.

आज यानी 11 मार्च 2026 के दिन सुप्रीम कोर्ट ने हरिश राणा के इच्छामृत्यु के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया. 13 साल की इस कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट ने कोमा में पड़े गाजियाबाद के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु देने की अनुमति दे दी है. लेकिन आखिर क्यों युवक को अपने इस दर्द को खत्म करने के लिए इतने सालो का इंतजार करना पड़ा? आइए जानते है ये यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु है क्या और भारत में इसको लेकर क्या प्रावधान है, जिसके चलते हरिश को इतना ज्यादा इंतजार करना पड़ा.

क्या है इच्छामृत्यु (Euthanasia)?

इच्छामृत्यु जिसे मेडिकल टर्मिनोलॉजी में ‘यूथेनेशिया’  कहते है, ग्रीक भाषा के दो शब्दों को जोड़कर बना है. इसमें ‘Eu’ का मतलब अच्छा और ‘Thanatos’ का मतलब मृत्यु है, जिसका अर्थ है, ‘गरिमापूर्ण मृत्यु’.

कब होता है इसका प्रावधान?

जब कोई व्यक्ति किसी ऐसी बीमारी से जूझ रहा हो जिसका कोई इलाज संभव न हो और दर्द इतना असहनीय हो कि दवाएं भी बेअसर हो जाएं, तब उसे मेडिकल सहायता से मौत दी जाती है.

वहीं इसको दो रुपों में बांटा गया है:

सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia): ये एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें डॉक्टर खुद मरीज को कोई घातक जहर या इंजेक्शन देकर उसकी जान लेते हैं. दुनिया के कुछ ही देशों में यह मान्य है, लेकिन भारत में यह पूरी तरह गैर-कानूनी है.

निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia): पैसिव यूथेनेशिया कई देशों में मान्य है. इसमें मरीज को जीवन देने वाली मशीनें (जैसे वेंटिलेटर, डायलिसिस या फीडिंग ट्यूब) हटा दी जाती हैं. भारत में इसी रूप या प्रकार को कानूनी मान्यता दी गई है. हालांकि इसमें भी कई सारी शर्ते होती है.

अरुणा शानबाग: भारत का पहला केस

भारत में इच्छामृत्यु की बहस अरुणा शानबाग के जिक्र के बिना अधूरी है. ये मामला देश का पहला मामला था जिसने इच्छामृत्यु जैसे विषय पर सोचने पर मजबूर किया. मुंबई के केईएम अस्पताल की नर्स अरुणा, जिनके साथ 1973 में एक वॉर्ड बॉय ने हैवानियत की, वे 42 साल तक ‘कोमा’ जैसी स्थिति में रहीं. उनकी सहेली पिंकी विरानी ने उन्हें एक जिंदा लाश के जिवन से मुक्ति दिलाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी.

इसी मामले में 7 मार्च 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार माना कि किसी व्यक्ति को मशीनों के सहारे जबरन जिंदा रखना उसके ‘सम्मान’ के खिलाफ है. हालांकि अरुणा की मौत 2015 में प्राकृतिक रूप से हुई, लेकिन उनके केस ने देश में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ के प्रावधान के बारे में गंभीरता से सोचने और इसे मान्य करने के दरवाजे खोल दिए.

भारत में इच्छामृत्यू के शर्ते?

बता दें कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और ऐतिहासिक फैसला सुनाया और ‘लिविंग विल’ (Living Will) को मंजूरी दी.

लिविंग विल: लिविंग विल एक ऐसा दस्तावेज है जिसे कोई भी स्वस्थ व्यक्ति पहले से ही कानूनी तौर पर तैयार कर सकता है. इसमें वह लिखता है कि “अगर भविष्य में मैं कोमा में चला जाऊं या ऐसी स्थिति में पहुंचूं जहां मेरा ठीक होना नामुमकिन हो, तो मुझे मशीनों के सहारे जिंदा न रखा जाए.

प्रक्रिया: इस विल पर दो गवाहों और एक नोटरी के हस्ताक्षर होने चाहिए. इसकी एक कॉपी जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास रहती है.

मेडिकल बोर्ड की भूमिका: जब ऐसी स्थिति आती है, तो डॉक्टरों की एक बोर्ड का गठन किया जाता है, जिसमें विशेषज्ञ शामिल होते है.  ये बोर्ड इस बात की पुष्टि करता है कि क्या मरीज वाकई लाइलाज स्थिति में है या नहीं. बोर्ड की रिपोर्ट के बाद ही लाइफ सपोर्ट हटाया जा सकता है.

बाकि देशों का क्या है हाल?

हालांकि ऐसे कई देश है जहां पर  यूथेनेशिया को कानूनी तौर पर मान्यता मिली लेकिन कई देशों में ये आज आज भी अमान्य है. दुनिया के हर देश में इसको लेकर अलग-अलग विचारधाराएं हैं. नीदरलैंड दुनिया का पहला देश था जिसने 2002 में इसे कानूनी बनाया. स्विट्जरलैंड में तो ‘डिग्निटी’ नाम की एक संस्था है जो लोगों को ‘असिस्टेड सुसाइड’ (सहायता के साथ आत्महत्या) में मदद करती है. वहीं, बेल्जियम और कनाडा जैसे देशों में भी इसके नियम काफी उदार हैं. वहीं, इसके उलट, कई इस्लामिक और ईसाई बहुल देश भी है, जहां पर धार्मिक आधार पर इसे ‘पाप’ माना जाता है.

इच्छामृत्यु: एक चुनौती

इच्छामृत्यु की सबसे बड़ी चुनौती इसका दुरुपयोग है क्योंकि संपत्ति के लालच में या बुजुर्गों को ‘बोझ’ समझकर लोग इस कानून का गलत फायदा भी उठाने की कोशिश कर सकते है. यही कारण है कि भारत में इस कानून को इतना जटिल बनाया गया है कि कोई भी आसानी से किसी की जान न ले सके और इस प्रावधान का दुरुपयोग कर सके.

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-भारत एक्सप्रेस



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