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पिता द्वारा बेटे की इच्छामृत्यु की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित

सुप्रीम कोर्ट ने 12 वर्षों से कोमा जैसी स्थिति और 100% विकलांगता (क्वाड्रिप्लेजिया) से जूझ रहे 31 वर्षीय हरीश राणा की इच्छामृत्यु (Euthanasia) याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है.

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Edited by Vaibhav Gupta

पिता द्वारा बेटे की इच्छामृत्यु की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सभी पक्षों की जिरह के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है.

ठीक होने की कोई संभावना

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि जो आर्टिफिशियल ट्यूब लगा हुआ है. उसे हटाने की अनुमति दी जाए. वही द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. जिसमें कहा गया है कि हरीश राणा के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है. सरकार ने भी इसका समर्थन किया है.

वहीं, पिछली सुनवाई के दौरान नोएडा जिला अस्पताल की एक मेडिकल टीम ने कोर्ट को बताया था कि 31 साल के व्यक्ति के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है, जो पिछले 12 वर्षों से पूर्णतः विकलांग है और स्थायी रूप से कोमा जैसी स्थिति में है.

100 फीसदी विकलांगता

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में कहा था कि उस व्यक्ति की हालत दयनीय है. हम उसे इस हालत में जीने नहीं दे सकते. गाजियाबाद के सीएमओ द्वारा दायर रिपोर्ट की जांच करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा था कि वह गंभीर बेड सोर से पीड़ित हैं, जिसका अर्थ है कि उनकी ठीक से देखभाल नहीं की जा रही थी.

कोर्ट ने ये भी कहा था कि सीलबंद लिफाफे में दायर रिपोर्ट में कहा गया है कि उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है. इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था. हरीश जिंदा है उसकी अभी सांसे चल रही है लेकिन वो 11 साल से बिस्तर पर पड़ा हुआ है. क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित, यानी 100 फीसदी विकलांगता से ग्रसित है.

हरीश एक जिंदा कंकाल

याचिका में कहा गया है कि हरीश एक जिंदा कंकाल की तरह 2013 से उसी बिस्तर पर यू ही पड़ा हुआ है. माता-पिता का कहना है कि हम हमेशा उसके पास नहीं रहेंगे, तो फिर उसका देखभाल कौन करेगा. राज सैट एयर कैटरिंग लिमिटेड में काम करने वाले पीड़ित के पिता ने बताया हमने एक साल तक हरीश की देखभाल के लिए 27000 रुपये प्रति माह के हिसाब से एक नर्स को रखा था. यह रकम उस समय मेरे 28000 रुपये के मासिक वेतन के लगभग बराबर थी.

20-25 हजार का मेडिककल खर्च

फिलहाल हरीश का हर महीने का मेडिकल खर्च 20000-25000 रुपये है, जिसमें दवाइयां, खाना और बेडसोर के ईलाज जैसी दूसरी जरूरी चीजें शामिल है. उनके मुताबिक, सरकार से कोई मदद नहीं मिल रही है और हम उसके मेडिकल खर्च वहन नहीं कर सकते है. हम ही जानते हैं कि हम कैसे काम चला रहे हैं.

हालांकि हरीश के अस्पताल में भर्ती होने पर परिवार को एक बार केंद्र सरकार की योजना से 50000 रुपये की आर्थिक मदद मिली थी.

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-भारत एक्सप्रेस



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