Bajra farming challenges: आधुनिक शहरी जीवनशैली में ‘हेल्थ कॉन्शियस’ लोगों के बीच बाजरे (Millet) का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है. रेस्टोरेंट्स से लेकर सुपरमार्केट तक बाजरे से बने डोसे, कुकीज और हेल्दी फूड्स की मांग आसमान छू रही है. लेकिन इस सुनहरी तस्वीर का एक दूसरा और कड़वा पहलू भी है. जमीनी स्तर पर किसान बाजरे की खेती से किनारा कर रहे हैं. जिस अन्न को भविष्य का ‘सुपरफूड’ माना जा रहा है, वह उगाने वालों के लिए घाटे का सौदा क्यों बन रहा है? जवाब है, बाजार की अनिश्चितता और सही कीमत (MSP) का न मिलना.
धान और मक्के के आगे क्यों हार रहा है बाजरा? (Bajra demand in India)
कृषि विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि किसानों को खेती में सुरक्षा चाहिए. जहां धान (चावल) की सरकारी खरीद की गारंटी है और मक्का खरीदने के लिए पोल्ट्री उद्योग जैसा बड़ा बाजार मौजूद है, वहीं बाजरे के लिए ऐसा कोई मजबूत सिस्टम अब तक विकसित नहीं हो पाया है.
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (TNAU) के आंकड़े इस संकट की गवाही देते हैं. राज्य में जहां धान की खेती 21.57 लाख हेक्टेयर में लहलहा रही है, वहीं ‘छोटे बाजरे’ की खेती सिमट कर मात्र 1.34 लाख हेक्टेयर रह गई है. नीलगिरी के किसान के. मोहन बताते हैं कि वे पहले रागी और समाई उगाते थे, लेकिन इसे बेचने में इतनी दिक्कतें आईं कि मजबूरन उन्होंने इसे छोड़कर चाय की खेती शुरू कर दी.
बाजरे के फायदे अनेक, फिर भी जोखिम क्यों? (MSP for Bajra)
इसे उगाने में पानी की बहुत कम जरूरत होती है और लागत भी नाममात्र की आती है. अनियमित बारिश या सूखे की स्थिति में भी यह बंपर उत्पादन दे सकता है. इसके बावजूद, मजबूत बाजार, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), और प्रोसेसिंग यूनिट्स की कमी के कारण किसान जोखिम उठाने से डरते हैं. विशेषज्ञों का दावा है कि अगर सरकारी खरीद प्रणाली दुरुस्त की जाए, तो अगले 3 साल में बाजरे का उत्पादन दोगुना हो सकता है.
पुदुकोट्टई का FPO मॉडल बना उम्मीद की किरण (Bajra in Healthy food)
इन तमाम चुनौतियों के बीच तमिलनाडु का सूखा प्रभावित पुदुकोट्टई जिला एक नई उम्मीद जगा रहा है. यहां ‘किसान उत्पादक संगठनों’ (FPOs) ने बाजरे की खेती को नया जीवन दिया है. इस पहल से 1300 से अधिक किसान जुड़े हैं, जिनमें 78% हिस्सेदारी महिलाओं की है.
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ये संगठन हर साल किसानों से करीब 600 टन बाजरा खरीदते हैं. सबसे खास बात यह है कि इस बाजरे से बने उत्पादों को अब सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी एक्सपोर्ट किया जा रहा है, जिससे किसानों की आय में सीधा सुधार हुआ है. इसी तरह विरुधुनगर के किसान आई. पैकियाराज भी कृषि विभाग की मदद से अपनी उपज का 80% हिस्सा ‘बीज’ के रूप में बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं. जरूरत सिर्फ पुदुकोट्टई जैसे मॉडल को पूरे देश में लागू करने की है.
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