इलाहाबाद हाइकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी भी खाद्य सामग्री में प्राकृतिक कारणों से गुणवत्ता में कमी आती है तो ऐसे में इसे मिलावट नहीं माना जाएगा. कोर्ट ने पनीर में मिलावट मामले में ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई छह माह की सजा को रद्द करते हुए दोषी दुकानदार को बरी कर दिया. यह आदेश न्यायमूर्ति समित गोपाल की पीठ ने पंचम सिंह चौहान की याचिका पर दिया.
20 नवंबर 2010 को खाद्य निरीक्षक ने चंदौली निवासी पंचम सिंह चौहान की दुकान से पनीर का सैंपल लिया था. सैंपल को जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा गया. रिपोर्ट में पता चला कि पनीर के दूध में वसा की मात्रा मानक से कम है.
रिपोर्ट में कहा गया कि न्यूनतम 50 प्रतिशत वसा होनी चाहिए लेकिन वसा की मात्रा मात्र 35.8 प्रतिशत है. इस कमी के कारण नमूने को मिलावटी घोषित कर दिया गया. दुकानदार के खिलाफ खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम शिकायत दर्ज की गई.
ट्रायल कोर्ट ने दोषी करार देते हुए छह महीने के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई. पंचम की अपील को भी अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने खारिज कर दिया. इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई.
याची अधिवक्ता की ओर से दलील दी गई कि खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि अगर प्राथमिक खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता में कमी प्राकृतिक कारणों से हो रही है, तो उसे मिलावटी नहीं माना जाएगा.
न्यायालय ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि दूध में वसा की मात्रा में कमी दूध की गुणवत्ता पर निर्भर करती है और इस पर विचार नहीं किया गया था. इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए पंचम को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
भारत एक्सप्रेस
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