Daya Basti Bulldozer Action: दिल्ली के दया बस्ती और जखीरा इलाके में पिछले 30-40 सालों से आशियाना बनाकर रह रहे हजारों गरीब परिवारों पर अचानक दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है. रेलवे प्रशासन ने अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए यहां करीब 1,000 से अधिक झुग्गियों को बुलडोजर चलाकर पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया है.
दिल्ली के दया बस्ती और जखीरा इलाके में रेलवे प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए करीब 1000 झुग्गियों को ध्वस्त कर दिया है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि नोटिस की तय सीमा से ज्यादा तोड़फोड़ की गई है, जिससे उनका भारी नुकसान हुआ है. चुनाव के समय ‘जहां झुग्गी वहां मकान’ का वादा करने वाले नेताओं के खिलाफ लोगों में भारी गुस्सा है और हजारों लोग अब बिना किसी पुनर्वास व्यवस्था के बेघर हो चुके हैं.
क्या है मामला? (Zakhira slum demolition railways)
दिल्ली के दया बस्ती और जखीरा क्षेत्र में रेलवे की जमीन पर किए गए अतिक्रमण के खिलाफ प्रशासन ने एक बेहद सख्त और बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया है. पिछले कई दशकों से बसी 1,000 से भी ज्यादा झुग्गियों को बुलडोजर चलाकर पूरी तरह से मलबे में तब्दील कर दिया गया. इस अचानक हुई कार्रवाई के बाद पूरे इलाके में चीख-पुकार मची हुई है और बेघर हुए लोगों में प्रशासन के खिलाफ भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है. स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्हें जगह खाली करने के लिए महज एक हफ्ते का समय दिया गया था, जो इतने बड़े पैमाने पर शिफ्टिंग के लिए बहुत कम था.
20 से 25 फीट तक का दायरा तोड़ा (Delhi Daya Basti bulldozer action)
पीड़ितों ने पुलिस और रेलवे प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आधिकारिक नोटिस में सिर्फ 13 से 15 फीट की जगह खाली करने की बात कही गई थी, लेकिन बुलडोजर ने नियमों को ताक पर रखकर 20 से 25 फीट तक का दायरा तोड़ दिया. इस कार्रवाई के दौरान कई दिल को झकझोर देने वाले दृश्य भी सामने आए, जहां एक बेबस मां की बेटी की अगले महीने होने वाली शादी का सारा दहेज और मेहनत की कमाई पल भर में मलबे के नीचे दफन हो गई. प्रशासन ने लोगों को अपना कीमती सामान सुरक्षित निकालने तक का पर्याप्त मौका नहीं दिया.
जहां झुग्गी, वहां मकान’ के नारों पर गंभीर सवाल उठे
इस बड़ी ध्वस्तीकरण कार्रवाई के बाद दिल्ली की सियासत भी गरमा गई है. बेघर हुए लोग अब चुनाव के समय राजनीतिक दलों द्वारा दिए जाने वाले ‘जहां झुग्गी, वहां मकान’ के नारों और वादों पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं. छोटे-छोटे मासूम बच्चों को लेकर ये हजारों परिवार इस भीषण मौसम में खुले आसमान के नीचे दाने-दाने को तरसने पर मजबूर हैं और उनके पुनर्वास के लिए फिलहाल कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है.
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-भारत एक्सप्रेस
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