बाहुबली उमाकांत यादव को इलाहाबाद HC से जमानत
Umakant Yadav Bail update: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भूमि फर्जीवाड़े के एक बेहद पुराने मामले में पिछले 6 साल से अधिक समय से जेल में बंद 74 वर्षीय बाहुबली और पूर्व सांसद उमाकांत यादव को सशर्त जमानत दे दी है. न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकलपीठ ने उमाकांत यादव की दूसरी जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश पारित किया.
जौनपुर के लाइन बाजार थाने में आईपीसी की संगीन धाराओं (419, 420, 467, 468, 471 और 120बी) के तहत दर्ज इस आपराधिक मामले में उमाकांत यादव पर लंबे समय से मुकदमा चल रहा है.
जानिए क्या था पूरा मामला?(Umakant Yadav Bail)
उमाकांत यादव पर आरोप है कि उन्होंने चकबंदी अधिकारी के साथ मिलीभगत करके ग्राम नटौली स्थित गाटा संख्या 525 व 534 की जमीन से जुड़े राजस्व अभिलेखों (सीएच-23) में फर्जी प्रविष्टियां करवाईं. आरोप के अनुसार, 26 अक्टूबर 1994 के एक कथित फर्जी आदेश के आधार पर उन्होंने जमीन का म्यूटेशन अपने नाम करा लिया था.
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि यह विवाद मूलतः 1975 के एक बैनामे और चकबंदी अभिलेखों से जुड़ा सिविल प्रकृति का मामला है, जिसकी सिविल याचिका पहले से ही हाईकोर्ट में लंबित है.
6 साल 5 महीने जेल में काटे
अदालत ने कानूनी पहलुओं की बारीकी से व्याख्या करते हुए कहा कि धारा 467 (जाली दस्तावेज बनाना, जिसमें उम्रकैद तक की सजा है) चकबंदी अभिलेखों पर लागू नहीं होती, क्योंकि ये मूल्यवान प्रतिभूति या वसीयत जैसे दस्तावेज नहीं हैं. इसलिए इस मामले (Umakant Yadav Bail) में अधिकतम सात साल सजा वाली धाराएं ही लागू होती हैं. कोर्ट ने ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता पहले ही 6 साल और 5 महीने जेल में बिता चुके हैं, जो कि अधिकतम सजा के काफी करीब है.
30 तारीखों के बाद भी तय नहीं हुए आरोप
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सह-अभियुक्त सरकारी अधिकारियों की पुनरीक्षण याचिकाओं पर साल 2023 से रोक लगी हुई है. इसके चलते निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) में करीब 30 तारीखें बीत जाने के बावजूद आज तक उमाकांत यादव के खिलाफ आरोप तक तय नहीं हो पाए हैं. हाईकोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी को मिले ‘शीघ्र सुनवाई के अधिकार’ का सीधा उल्लंघन माना और ढिलाई पर नाराजगी जताई.
राज्य सरकार ने गिनाया 77 मुकदमों का इतिहास
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल ने उमाकांत यादव के 77 मुकदमों वाले लंबे-चौड़े आपराधिक इतिहास का हवाला देते हुए जमानत का पुरजोर विरोध किया. लेकिन हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि केवल पुराना आपराधिक इतिहास किसी की जमानत रोकने का अकेला आधार नहीं बन सकता, जब तक कि गवाहों को डराने-धमकाने या सबूतों से छेड़छाड़ की कोई ठोस आशंका न हो. कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि आवेदक को दो अन्य दोषसिद्धि वाले मामलों में भी पहले ही जमानत मिल चुकी है.
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-भारत एक्सप्रेस
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