Belchi Massacre: बिहार के पटना जिले का बेलछी गांव 27 मई 1977 को एक ऐसी दर्दनाक घटना का गवाह बना, जिसे आज भी राज्य के सबसे भयावह जातीय नरसंहारों में गिना जाता है. उस दिन जो हुआ, उसने सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि पूरे देश को हिला कर रख दिया था.
दोपहर के आसपास का समय था जब करीब 60 से 70 हथियारबंद लोग गांव में घुसे. आरोप था कि इनका नेतृत्व स्थानीय कुर्मी जमींदार महावीर महतो कर रहा था. हमलावरों का निशाना मुख्य रूप से पासवान (दलित) समुदाय और कुछ सुनार (पिछड़ा वर्ग) परिवार थे. गांव में अफरा-तफरी मच गई और लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे, लेकिन कई लोग बच नहीं पाए.
हिंसा का वह खौफनाक मंजर
इस हमले में 11 लोगों को पकड़कर उनके हाथ-पैर बांध दिए गए और फिर उन्हें गोली मार दी गई. मरने वालों में 8 दलित और 3 सुनार समुदाय के लोग शामिल थे. इसके बाद जो हुआ, वह और भी भयावह था. इन शवों को एक साथ जलाकर एक बड़ी चिता बना दी गई. कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि इस चिता को तैयार करने में कुछ महिलाओं और बच्चों को भी मजबूर किया गया.
इस पूरी घटना के पीछे लंबे समय से चल रहे जमीन विवाद, मजदूरी को लेकर तनाव और जातीय वर्चस्व की राजनीति को कारण माना जाता है. बाद में एक सर्वाइवर की गवाही इस केस में बेहद अहम साबित हुई और अदालत ने कई दोषियों को सजा दी. कुछ को फांसी और कई को आजीवन कारावास.
इंदिरा गांधी का बेलछी दौरा और राजनीति में नया मोड़
यह घटना उस समय हुई जब इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर थीं. 1977 के चुनाव में हार के बाद कांग्रेस कमजोर स्थिति में थी और जनता पार्टी की सरकार सत्ता में थी. लेकिन बेलछी नरसंहार की खबर ने राजनीतिक माहौल बदलना शुरू कर दिया.
13 अगस्त 1977 को इंदिरा गांधी खुद बेलछी पहुंचीं. बारिश का मौसम था, रास्ते कीचड़ से भरे थे और कार आगे नहीं बढ़ सकी. हालात ऐसे बने कि उन्हें पास से एक हाथी ‘मोती’ मंगवाकर उस पर सवार होकर गांव जाना पड़ा. यह दृश्य बेहद प्रतीकात्मक बन गया—एक पूर्व प्रधानमंत्री, जो सत्ता से बाहर होकर भी पीड़ितों तक पहुंचने की कोशिश कर रही थीं.
गांव के लोगों, खासकर महिलाओं ने उन्हें देखकर भावुक प्रतिक्रिया दी. किसी ने उन्हें “देवी” तक कह दिया. उनकी भीगी हुई साड़ी को बदलकर ग्रामीणों ने उन्हें एक सूखी लाल साड़ी दी.
राजनीतिक असर जो दूर तक गया
इस एक दौरे ने इंदिरा गांधी की छवि को फिर से मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई. दलित और गरीब तबके के बीच उनकी पहचान वापस बनी और मीडिया में इस घटना को खूब जगह मिली. कई इतिहासकार मानते हैं कि यही वह मोड़ था जिसने 1980 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की जमीन तैयार की.
बेलछी नरसंहार आज भी सिर्फ एक दर्दनाक घटना नहीं, बल्कि उस मोड़ की तरह याद किया जाता है जहां हिंसा ने राजनीति की दिशा बदल दी और एक नेता की वापसी की कहानी भी लिख दी.
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-भारत एक्सप्रेस
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