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‘यह जो बिहार है’ और ‘हमर चंपारण’- बिहार की आत्मा और इतिहास के गहन चिंतन को उकेरती अरविंद मोहन की पुस्तकें

बिहार को समझना दरअसल भारत की उस आत्मा को समझना है, जो तर्क करती है, सवाल पूछती है और हर स्थापित सत्य को चुनौती देती है. यहां ‘मैं’ का स्थान ‘हम’ ने ले लिया है. यह सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि एक सोच है.

22 मार्च को बिहार दिवस मनाया जाता है. यह दिन 1912 में बंगाल से बिहार के अलग होने की याद दिलाता है. लेकिन आज यह सिर्फ तारीख़ नहीं, बल्कि बिहार की पहचान, उसकी समृद्ध विरासत और वर्तमान चुनौतियों पर विचार करने का अवसर भी है. ठीक इसी समय राजकमल प्रकाशन ने वरिष्ठ पत्रकार और लेखक अरविंद मोहन की दो महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित की हैं ‘यह जो बिहार है’ और ‘हमर चंपारण’. दोनों किताबें बिहार की जड़ों, स्वभाव और संघर्ष को नई रोशनी में पेश करती हैं. अरविंद मोहन, जिन्होंने जनसत्ता, इंडिया टुडे, हिंदुस्तान, अमर उजाला और एबीपी न्यूज में दशकों की पत्रकारिता की है, गांधी, जाति-चुनाव और समाज-विज्ञान पर गहन अध्ययन के लिए जाने जाते हैं.

ये पुस्तकें उनके उसी अध्ययन का नतीजा हैं और बिहार दिवस पर इन्हें पढ़ना बिहार को समझने का नया नजरिया देता है.

‘यह जो बिहार है’: गर्व और पिछड़ेपन के बीच की सच्चाई

‘यह जो बिहार है’ (ISBN: 9789360866563, 236 पृष्ठ) बिहार के स्वभाव, उसकी ताकत और कमजोरियों का सजीव चित्रण है. लेखक पूछते हैं – बिहार वास्तव में क्या है और किसी बिहारी को इस पर गर्व क्यों करना चाहिए? पुस्तक बताती है कि बिहार की बनावट में राजा जनक, याज्ञवल्क्य, पाणिनी, आर्यभट्ट, बुद्ध, महावीर, पतंजलि, चाणक्य, सिख गुरु, कबीर, गोरखनाथ से लेकर महात्मा गांधी तक का योगदान है. यहां ज्ञान की उत्कंठा कहीं और दुर्लभ है. मूल्यबोध को शासकों ने नहीं, दार्शनिकों ने गढ़ा है. तर्क और विमर्श पर भक्ति और अनुकरण को तरजीह दी जाती रही है. आज भी बिहार से आने वाले छात्रों और पाठकों की बहसें सबसे ऊर्जावान और अलग क्यों दिखती हैं?

लेकिन पुस्तक सिर्फ गौरव-गाथा नहीं है. वह बिहार के वर्तमान को भी बेनकाब करती है. विकास के हर पैमाने पर आखिरी पायदान, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, परिवहन और नागरिक सुविधाओं में पिछड़ापन, लाखों मजदूरों का पलायन और ‘बिहारी’ शब्द को नीचा दिखाने की कोशिश. लेखक अलग-अलग समय के अपने आलेखों और विशेष रूप से इस किताब के लिए लिखी नई सामग्री से इनके राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों की पड़ताल करते हैं.

किताब का एक अंश विशेष रूप से विचारोत्तेजक है. दिल्ली में एक युवा अध्यापक के फेसबुक पोस्ट से शुरू होती है चर्चा – बिहारी ‘मैं’ की जगह ‘हम’ क्यों बोलते हैं? क्या यह अहंकार-शून्यता, सामूहिकता, विनम्रता या भाषाई संस्कृति का हिस्सा है? ममता कालिया, असगर वजाहत, सदानंद शाही, अविनाश मिश्र जैसे बुद्धिजीवियों के कमेंट्स के जरिए लेखक बिहार की सामूहिकता, संयुक्त परिवार, बौद्ध प्रभाव और बोली-भाषा की विशिष्टता को उजागर करते हैं. यह अंश दिखाता है कि बिहार की पहचान सिर्फ इतिहास में नहीं, रोजमर्रा की भाषा और व्यवहार में भी बसती है.

‘हमर चंपारण’: गांधी से पहले और बाद का चंपारण

दूसरी पुस्तक ‘हमर चंपारण’ बिहार के एक खास जिले चंपारण को समर्पित है. चंपारण आज मुख्यतः गांधी से जुड़कर याद किया जाता है, जहां उन्होंने भारत में सत्याग्रह और अहिंसा का पहला प्रयोग किया. लेकिन पुस्तक बताती है कि इसका इतिहास इससे कहीं पुराना है – राजा जनक, सीता, वाल्मीकि, लव-कुश, बुद्ध, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, हर्षवर्धन तक. ‘हमर चंपारण’ (हमारा चंपारण) नाम ही उस भाव को व्यक्त करता है जिसे चंपारणवासी महसूस करते हैं.

पुस्तक दो भागों में बंटी है – ‘कुछ अपनी’ और ‘कुछ पराई’. पहले भाग में अरविंद मोहन अपनी भावनात्मक जुड़ाव के साथ चंपारण का ऐतिहासिक-भौगोलिक परिचय देते हैं. चंपारण सत्याग्रह, नील की खेती, निलहों का जुल्म, लोगों का संघर्ष, ध्रुपद की परंपरा, गन्ने की खेती और चीनी मिलों जैसे विषयों पर उनके शोधपरक आलेख चंपारण का विस्तृत चित्र खींचते हैं. दूसरे भाग में वे उन लेखकों की सामग्री पेश करते हैं जिन्होंने चंपारण को गहराई से देखा – जॉन बीम्स, नगेन्द्रनाथ गुप्त, राजेंद्र प्रसाद, पीर मुहम्मद मूनिस, शम्भुनाथ मिश्र और खुद महात्मा गांधी. यह किताब न सिर्फ तथ्यों का विश्लेषण है, बल्कि चंपारण के ‘भाव-चित्र’ को भी साकार करती है.

अरविंद मोहन पहले भी चंपारण पर लिख चुके हैं (जैसे ‘चंपारण सत्याग्रह की कहानी’ और ‘चंपारण सत्याग्रह के सहयोगी’), लेकिन ‘हमर चंपारण’ उस विरासत को और समृद्ध करती है. बिहार दिवस पर यह पुस्तक याद दिलाती है कि चंपारण बिहार की स्वतंत्रता संग्राम की जड़ है और उसकी आर्थिक-सामाजिक विडंबनाएं आज भी प्रासंगिक हैं.

बिहार दिवस पर नई सोच और आत्ममंथन का अवसर

दोनों पुस्तकें एक-दूसरे को पूरक बनाती हैं. ‘यह जो बिहार है’ पूरे बिहार की आत्मा को समझाती है तो ‘हमर चंपारण’ उसके एक महत्वपूर्ण हिस्से को गहराई से खोलती है. दोनों में अतीत की गरिमा और वर्तमान की चुनौतियां साथ-साथ चलती हैं. अरविंद मोहन की लेखनी न तो सिर्फ आलोचना करती है, न सिर्फ गौरवगान. वह समझने और समझाने का प्रयास करती है.

बिहार दिवस 2026 पर ये किताबें पाठकों को नई समझ देती हैं. बिहार सिर्फ पिछड़ापन नहीं, बल्कि ज्ञान, संघर्ष और सामूहिकता की भूमि भी है. राजकमल प्रकाशन की इन नई आमदों को पढ़कर कोई भी बिहारी या बिहार को समझने वाला व्यक्ति गर्व के साथ सवाल भी कर सकता है बिहार का भविष्य क्या होगा?

ये पुस्तकें दिल्ली विश्व पुस्तक मेले 2026 में भी चर्चा का विषय रहीं. इन्हें पढ़ना न सिर्फ स्मृति है, बल्कि बिहार को नई दिशा देने का संकल्प भी.

अरविंद मोहन की ये दो किताबें बिहार को न सिर्फ याद दिलाती हैं, बल्कि उसे समझने और बदलने की प्रेरणा भी देती हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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