अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भी बड़े-बड़े वादे होते हैं, तो अक्सर ऐसा देखा गया है कि सम्मेलन खत्म होने के बाद कैमरे बंद हो जाते हैं, नेता अपने-अपने घर लौट जाते हैं और उन वादों की फाइलों पर धूल जमने लगती है. दुनिया भर की संधियां, डिक्लेरेशन और कूटनीतिक समझौतों के साथ यह एक बहुत पुरानी समस्या रही है. हर साल देशों की अध्यक्षता बदलती है, नए मंत्री आते हैं, प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और पुराना एजेंडा कहीं पीछे छूट जाता है.
लेकिन, भारत ने अब इस ढर्रे को बदलने की पूरी तैयारी कर ली है. नई दिल्ली में हाल ही में संपन्न हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा है, जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के काम करने के तरीके को हमेशा के लिए बदल सकता है. यह प्रस्ताव एक सुरक्षित डिजिटल रिपॉजिटरी और डिजिटल अकाउंटेबिलिटी मैकेनिज्म का है.
क्या है यह ब्रिक्स डिजिटल रिपॉजिटरी का प्रस्ताव?
यह ब्रिक्स देशों के फैसलों का एक सुरक्षित डिजिटल रिकॉर्ड और मॉनिटरिंग सिस्टम है. इसे एक बड़े ‘निरंतरता और क्रियान्वयन तंत्र’ (Continuity and Implementation Mechanism) के साथ जोड़ा जाएगा. यह सिस्टम त्रयी यानी ट्रोइका (Troika) फॉर्मेट पर काम करेगा, जिसमें पिछले साल का अध्यक्ष देश, वर्तमान अध्यक्ष देश और अगले साल का अध्यक्ष देश शामिल होंगे.
इस डिजिटल सिस्टम की खूबी यह होगी कि ब्रिक्स सम्मेलन में लिया गया हर एक फैसला, उससे जुड़े नोडल अधिकारी (जिम्मेदार व्यक्ति), उसकी समयसीमा (टाइमलाइन) और उसका ताजा स्टेटस ऑनलाइन दर्ज किया जाएगा. यानी किसी भी सदस्य देश के पास यह देखने के लिए एक साझा प्लेटफॉर्म होगा कि किस समझौते पर क्या बात हुई थी, किसकी जिम्मेदारी तय की गई थी और कौन सा काम अभी पेंडिंग है. प्रधानमंत्री मोदी ने इस विचार को इसलिए सामने रखा ताकि जैसे-जैसे ब्रिक्स का दायरा बढ़ रहा है और यह अपने तीसरे दशक में प्रवेश कर रहा है, वैसे-वैसे इसके संस्थागत पन्नों पर फैसलों का सिलसिला न टूटे.
नई दिल्ली शिखर सम्मेलन और क्रियान्वयन पर फोकस
12 से 13 सितंबर 2026 तक नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की थीम थी ‘बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंसी, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी’ (लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता का निर्माण). यह साल ब्रिक्स का 20वां स्थापना वर्ष भी था, इसलिए भारत की अध्यक्षता में यह सम्मेलन ऐतिहासिक बन गया.
पीएम मोदी ने साफ कर दिया कि जब तक हम अगले दो दशकों के लिए कोई बड़ा और महत्वाकांक्षी एजेंडा सेट करें, उससे पहले हमें अपने घर की प्रशासनिक व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा. यह डिजिटल रिपॉजिटरी किसी भी घोषणा को केवल कागज का टुकड़ा नहीं रहने देगी, बल्कि उसे ट्रैक करने योग्य प्रतिबद्धता में बदल देगी. नई दिल्ली घोषणापत्र में भी इस बात पर जोर दिया गया कि ब्रिक्स का संस्थागत विकास ऐसा होना चाहिए जो सिर्फ कागजी न हो, बल्कि परिणाम-उन्मुख (outcome-oriented) हो.
इस प्रस्ताव के मुख्य बिंदु क्या हैं?
- ट्रोइका-आधारित फॉलो-अप सिस्टम: पिछला, वर्तमान और आगामी अध्यक्ष देश मिलकर काम करेंगे ताकि हर साल कुर्सी बदलते ही काम शून्य से न शुरू हो.
- निर्णय-स्तरीय ट्रैकिंग: शिखर सम्मेलन के फैसलों को जिम्मेदार प्राधिकरणों, समयसीमा और प्रगति अपडेट के साथ रिकॉर्ड किया जाएगा.
- एक सुरक्षित डिजिटल रिपॉजिटरी: पीएम मोदी ने एक ऐसे सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जोर दिया है, जहां डेटा पूरी तरह सुरक्षित हो और चुनिंदा स्तर पर नियंत्रित पहुंच हो.
- डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ाव: भारत ने पुणे में हुई बैठकों में ब्रिक्स डीपीआई रिपॉजिटरी और पायलट प्रोजेक्ट्स पर भी जोर दिया है.
- ऑनलाइन आनुवंशिक डेटाबेस: नई दिल्ली घोषणापत्र में ब्रिक्स ऑनलाइन आर्काइवल डेटाबेस पर प्रगति का स्वागत किया गया है.
अंतरराष्ट्रीय संधियों के लिए यह क्यों है खास?
अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों की सबसे बड़ी कमजोरी यह होती है कि उन पर हस्ताक्षर तो आसानी से हो जाते हैं, लेकिन जब अधिकारी बदलते हैं तो उनकी निगरानी करना मुश्किल हो जाता है. यह साझा डिजिटल रिपॉजिटरी किसी समझौते को कानूनी रूप से ज्यादा मजबूत तो नहीं बनाएगी, लेकिन इससे पारदर्शिता इतनी आ जाएगी कि उन वादों को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.
सरकार-से-सरकार के बीच काम करने वाला यह डैशबोर्ड मंत्रालयों के बीच का दोहराव रोकेगा और यह साफ बताएगा कि कौन सा काम पूरा हो चुका है, कौन सा धीमा है और किस पर अभी काम होना बाकी है. इससे यह साबित होता है कि डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ आम नागरिकों को सेवाएं देने के लिए नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों को अनुशासन में बांधने के लिए भी किया जा सकता है.
भारत ग्लोबल गवर्नेंस को दे रहा है नया मॉडल
भारत हमेशा से डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) को दुनिया के सामने एक मजबूत गवर्नेंस मॉडल के तौर पर पेश करता रहा है. ब्रिक्स के आईसीटी ट्रैक के दौरान भारत ने यह साफ कर दिया कि डीपीआई का मतलब सिर्फ फाइलें अपलोड करना नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी तय करना, समयसीमा बांधना और संस्थागत याददाश्त (institutional memory) को सुरक्षित रखना है.
ब्रिक्स जैसे समूह में, जहां दुनिया के अलग-अलग राजनीतिक प्रणालियों और विकास प्राथमिकताओं वाले 11 देश शामिल हैं और जो दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहां इस तरह की प्रशासनिक स्पष्टता बहुत जरूरी है. जैसे-जैसे ब्रिक्स का परिवार बड़ा हो रहा है, मंत्रालयों और नीतियों की संख्या भी बढ़ रही है. ऐसे में तालमेल बिठाना और भी जटिल हो गया है. यह डिजिटल रिपॉजिटरी राजनीतिक असहमतियों को तो शायद न सुलझाए, लेकिन प्रक्रियागत विफलताओं (process failures) को जरूर रोक सकती है.
आगे की राह और कुछ सवाल
यह आइडिया शानदार है, लेकिन इसके सामने कुछ व्यावहारिक सवाल भी हैं, जिन्हें ब्रिक्स देशों को मिलकर सुलझाना होगा. जैसे:
- रिकॉर्ड कौन अपडेट करेगा और समय पर सही जानकारी कौन डालेगा?
- इस जानकारी को कौन-कौन देख सकेगा. क्या यह सिर्फ सरकारों तक सीमित रहेगा या इसमें बिजनेस और सिविल सोसाइटी की भी पहुंच होगी?
- यदि कोई देश यह माने कि काम पूरा हो गया और दूसरा देश कहे कि नहीं हुआ, तो विवादों को कैसे सुलझाया जाएगा?
- कूटनीतिक समयसीमा और संवेदनशील संपर्कों को सुरक्षित रखने के लिए साइबर सुरक्षा के मानक क्या होंगे?
ये सारे सवाल इस प्रस्ताव की कमजोरी नहीं, बल्कि इसके अगले चरण की रूपरेखा तय करते हैं. चीन 2027 में ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालने जा रहा है, ऐसे में भारत की अध्यक्षता से चीन को मिलने वाली कमान इस मैकेनिज्म के लिए पहली बड़ी परीक्षा होगी.
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