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विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर: ‘छत पर मैराथन’–पत्रकारिता की सच्ची दौड़ का दस्तावेज

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विजय विद्रोही की किताब ‘छत पर मैराथन’ ने पत्रकारिता के संघर्ष और सच्चाई को सामने रखा. यह पुस्तक बताती है कि प्रेस की आज़ादी हर दिन की लड़ाई है, कोई स्थायी अधिकार नहीं…

Edited by Rohit Agrawal

आज 3 मई, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस. इस दिन हम प्रेस की स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा और सूचना के अधिकार के महत्व पर विचार करते हैं. ठीक इसी संदर्भ में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित विजय विद्रोही की नई पुस्तक ‘छत पर मैराथन’ अत्यंत प्रासंगिक और प्रेरणादायक बन जाती है.

पुस्तक का परिचय

वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक लगभग 152 पृष्ठों की है. लेखक विजय विद्रोही वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने मर्चेंट नेवी की नौकरी छोड़कर 1987 में पत्रकारिता में प्रवेश किया. करीब 38-40 वर्षों की इस यात्रा को उन्होंने एक मैराथन की संज्ञा दी है – और वह भी छत पर.

‘छत पर मैराथन’ शीर्षक अत्यंत सटीक और प्रतीकात्मक है. छत खुली जगह होती है – न नीचे जमीन की सुरक्षा, न छत की कोई ठोस दीवार. वहां धूप तपाती है, बारिश भिगोती है, तेज हवाएं चुनौती देती हैं और हर कदम फिसलन भरा होता है. फिर भी दौड़ जारी रखनी पड़ती है. यही पत्रकारिता का यथार्थ है – खुला, जोखिमपूर्ण और अनथक.

पुस्तक का मूल वाक्यांश है:

38 सालों से पत्रकारिता की दौड़ में कुछ मील के पत्थर, कुछ स्पीड ब्रेकर, विकल्पों के दोराहे, अनिर्णय के चौराहे और लाल-पीली हरी बत्तियों के अनुशासन के बीच अंदर के पत्रकार को बचाए रखने का सीधा-सच्चा दस्तावेज़.”

पुस्तक में क्या है?

यह केवल संस्मरण नहीं, बल्कि पत्रकारिता के बदलते स्वरूप का महत्वपूर्ण दस्तावेज है. इसमें शामिल हैं:

व्यक्तिगत अनुभव : लेखक के करियर के महत्वपूर्ण मोड़, चुनौतियां और सफलताएं.
पत्रकारिता की आंतरिक दुनिया : खबरों के पीछे का सच, संपादकीय दबाव, व्यावसायिक हकीकत और नैतिक दुविधाएं.
तकनीक बनाम साख का संघर्ष : डिजिटल युग में सोशल मीडिया, फेक न्यूज और एल्गोरिदम के दौर में पारंपरिक पत्रकारिता की साख कैसे बचाई जाए.
आंतरिक संघर्ष : “अंदर के पत्रकार” को बनाए रखने की जद्दोजहद – यानी आदर्शों, सत्य और निडरता को बनाए रखना जबकि बाहरी दबाव लगातार बढ़ रहे हों.

लेखक ने अपनी यात्रा को स्पीड ब्रेकर और ट्रैफिक सिग्नल्स के रूप में देखा है, जो दर्शाता है कि पत्रकारिता में सफलता सीधी रेखा में नहीं, बल्कि मोड़ों, रुकावटों और सही समय पर सही फैसले लेने में छिपी है.

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस से संबंध

वर्तमान समय में जब वैश्विक स्तर पर पत्रकारों पर हमले बढ़ रहे हैं, भारत समेत कई देशों में प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में गिरावट दर्ज की जा रही है, और स्वतंत्र आवाजों को दबाने की कोशिशें हो रही हैं – ऐसी किताब विशेष रूप से महत्वपूर्ण है.

यह पुस्तक हमें याद दिलाती है :

  • प्रेस की स्वतंत्रता कोई मिला अधिकार नहीं, बल्कि रोजाना लड़कर हासिल किया जाने वाला गुण है.
  • सच्चे पत्रकार “छत” पर दौड़ते रहते हैं, भले नीचे आरामदायक सड़कें हों.
  • युवा पत्रकारों को इस मैराथन के लिए तैयार रहना चाहिए – शारीरिक, मानसिक और नैतिक रूप से.

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के इस अवसर पर ‘छत पर मैराथन’ सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि उन सभी पत्रकारों को श्रद्धांजलि है जो बिना शोर के, बिना रुके, सत्य की दौड़ में लगे रहते हैं. यह रचना हमें प्रेरित करती है कि चाहे कितनी भी चुनौतियां हों, “अंदर का पत्रकार” कभी न मरे.

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-भारत एक्सप्रेस



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